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को पूरी नहीं कर सकता है, इससे उसको उस अवस्था में मनुष्यायु और तित्रायु का बन्ध नहीं होता है।"
अस्थमस्व
उक्त प्रमाणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि ४ प्रकृतियों के बन्ध का पक्ष विशेष सम्मत और युक्तियुक्त प्रतीत होता । फिर भी ६६ प्रकृतियों के बन्ध को मानने वाले आचार्यों का क्या अभिप्राय है, यह केबलीगम्य है |
मारांश यह है कि एकेन्द्रिय, विकलत्रय द्वीन्द्रिय, श्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पृथ्वीकra, अकाय और वनस्पतिकाय के जीव सास्वादन गुणस्थान में सुक्ष्मत्रिक आदि तेरह प्रकृतियों को पहले freera reस्थान की बंधयोग्य १०६ प्रकृतियों में से कम करने पर ९६ प्रकृतियों को बाँधने हैं तथा किन्हीं किन्हीं आचार्यों का मत है कि इन एकेन्द्रिय आदि वनस्पतिकायपर्यन्त सात मार्गेणा वाले जीवों के सास्वादन गुणस्थान में शरीरपर्याप्ति पूर्ण न होने से परभव सम्बन्धी मनुष्यायु और तिचा का भी बन्ध नहीं होता है । अतः ये ६४ प्रकृतियों का बंध करते हैं ।
एकेन्द्रिय आदि के बन्धस्वामित्व का कथन करने के बाद आगे की गाथा में पंचेन्द्रिय, गतिवस और योग मार्गेणा सम्बन्धी duafora को बतलाते हैं
ओहु पणिदि तसे गइतसे जिविकार नरतिमुच्च विणा । मणत्रयजोगे ओहो उसे नरभंगु तम्मिस्से १३ गाथार्थ - पंचेन्द्रिय जाति व सकाय में ओघ - वैधाधिकार में बताये गये बन्ध के समान बन्ध जानना तथा गलियस में जिनएकादश तथा मनुष्यमिक एवं उच्चगोत्र के सिवाय शेष २०५ प्रकृतियों का बन्ध होता है तथा मनोयोग और वचनयोग में ओघ बन्धाधिकार के समान तथा औदारिक काययोग में मनुष्य गति के समान बन्ध समझना और औदारिक मिश्र में ant at afa आगे की गाथा में करते हैं ।