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________________ बलस्वामित्व कषाय निमित्तक २५ प्रकृतियों और मनुष्यमशि-योग्य छह प्रकृतियों कुल ३२ प्रकृतियों का बन्ध न होने से दूसरे गुणास्थान की बंधोग्य १०१ प्रकृतियों में से जन ३२ प्रकृतियों को कम करने से मिश्रगुणस्थान में ६६ प्रकृतियों का तथा मिथ गुणस्थान की उक्त ६६ प्रकृतियों में देवायु का वन्ध होना संभव होने से चौथे गुणस्थान में ७० प्रकृतियों का तथा इन ७० प्रकृतियों में से अप्रत्याख्यानावरण चापायचतुष्क को कम करने से पाँच देशविरत गुणस्थान में ६६ प्रकृतियों का धन्ध होता है । इस प्रकार से सियंचगति में पर्याप्ततिर्यचों के बन्धस्वामित्व का वर्णन करने के बाद आगे की गाथा में मनुष्यमति के पर्याप्त और अपर्याप्त मनष्यों और अपर्याप्त नियंत्रों के बावाशिव को बतलाते हैं इय चउपुणेसु वि नरा परमजया सजिग ओह वेसाई । जिणइपकारसहोणं नवसङ अपजत्ततिरियनरा El गाथा--पर्याप्तमनुष्य पहले से चौथे गुणस्थान तक पर्याप्ततियंत्र के समान प्रकृतियों को बांधते हैं। परन्तु इतना विशेष समझना कि सम्यग्दृष्टि पर्याप्तमनुष्य तीर्थकरनामकर्म का बन्ध कर सकते हैं, किन्तु पर्याप्ततिबंध नहीं तथा पाँच गुणस्थान से लेकर आगे के गुणस्थानों में सामान्य से कमस्तव (द्वितीय कर्मग्रन्थ} में कहे गये अनुसार कर्मप्रशतियों को बांधते हैं । अपर्याप्ततियंच और मनुष्य तीर्थङ्कर नामकर्म आदि ग्यारह प्रकृतियों को छोड़कर शेष १०६ प्रकृतियों का बंध करते हैं। विशेषार्थ ---इस गाथा में पर्याप्तमनुध्य और अपर्याप्ततिपंच तथा मनुष्यों के बंधस्वामित्व को बतलाया गया है। मनुष्यगतिनामकर्म और मनुष्यायु के उदय से जो मनुष्य कहलाते हैं अपया जो मन के द्वारा नित्य ही हेय-उपादेय, तत्व
SR No.090241
Book TitleKarmagrantha Part 3
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages267
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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