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तृतीय कर्मग्रन्थ
तियंचगति में पर्याप्ततियंत्र के सामान्य से तथा पहले मिथ्यात्व गुणस्थान की अपेक्षा बन्धस्वामित्व का कथन करने के बाद आगे की गाथा में पर्याप्ततिर्यच के दूसरे से पाँचवें गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में स्वामित्व को बतलाते हैं---
fer नरयसो सासणि सुराउ अण एगतीस विष्णु मीले। ससुराज सर्वार सम्मे मोयकसाए विना वेसे ॥ ८ ॥
गाथार्थ -- सास्वादन गुणस्थान में नरकत्रिक आदि सोलह प्रकृतियों के बिना तथा मिश्र गुणस्थान में देवायु और अनन्तानुबंधीचतुष्क आदि इकतीस के बिना और सम्यक्त्व गुणस्थान में tary सहित सत्तर तथा देशविरत गुणस्थान में दूसरे कषाय के बिना पर्याप्ततिच प्रकृतियों का बन्ध करते हैं ।
विशेषार्थ - सामान्य से और मिथ्यात्व गुणस्थान में पर्याप्ततिर्यंचों के स्वामित्व को बतलाने के बाद यहाँ दूसरे मे लेकर पांचवें गुणस्थानपर्यन्त कर्मबन्ध को बतलाते हैं ।
पर्याप्त तचों के सामान्य से तथा पहले मिथ्यात्व गुणस्थान में ११७ प्रकृतियों का बन्ध होता है, उनमें से मिध्यात्व के उदय से बँधने वाली जो प्रकृतियाँ हैं, उनका सास्वादन गुणस्थान में मिथ्यात्व का उदय न होने से नरकत्रिक नरकगति, नरकानुपूर्वी, नरकायु, जातिचतुष्क - एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय, श्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, स्थावरचतुष्क. स्थावरनाम, सूक्ष्मनाम, अपर्याप्तनाम, साधारणनाम, हुँड संस्थान, सेवाले संहनन, आतपनाम, नपुंसकवेद, और frerraratata इन सोलह प्रकृतियों का बन्ध नहीं होने से १०१ प्रकृतियों का बन्ध होता है ।'
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१. नरसिंग जाइ थावरच डायवछिक्ट्ठ नघुम सोलो हि स सासण
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- कर्मग्रन्थ
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