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बन्धस्वामित्व
यह है कि इसी गाथा में 'पंकाइस' पद दिया है, जिसका अर्थ है कि पंकप्रभा आदि मरकों में बन्धस्वामित्व का कथन अलग से किया जायगा । इसी कारण पंकप्रभा नामक चौथे नरक से पहले के राप्रभा, शर्कराप्रभा, बालकाप्रभा इन तीन नरकों का यहाँ ग्रहण किया गया है तथा 'कासु' पद से पंकप्रभा आदि शेष नरकों का ग्रहण करना चाहिए लेकिन 'पंकाइसु' इस पद से पंकप्रभा, धूमप्रभा और तमप्रभा इन तीनों नरकों का ग्रहण किया गया है, क्योंकि आगे की माथा में महातमःप्रभा नामक सातवे नरक का बन्धस्वामित्व अलग से कहा है। इस गाथा में तो लीर्थकरनामकर्म का बन्धस्वामित्व पंकप्रभा आदि महातम प्रभा पर्यन्त के नारक जीवों के होता ही नहीं है, इस बात को बताने के लिए पकाइम' पद दिया है। ___पंप आदि भौथा, पौसला और छठा-नम मौन नरकों में तीरनामकर्म का बन्ध नहीं होता है।
पकप्रभा आदि में तीर्थ धरनामकर्म के बन्धस्वामित्व न होने का कारण यह है कि पंकप्रभा, धूमप्रभा और तमःप्रभा नरकों में सम्यक्त्व प्राप्ति होने पर भी क्षेत्र के प्रभाव से और लथाप्रकार के अध्यवसाय का अभाव होने से तीर्थकरनामकर्म का बन्ध नहीं होता है । क्योंकि शास्त्र में कहा गया है कि पहले नरक में आया जीव चक्रवर्ती हो सकता है । दूसरे नरक तक से आया जीव वासुदेव हो सकता है और तीसरे नरक तक से आया जीव तीर्थकर हो सकता है। चोथे नरक तक से आया जीव केवली और पांचवे नरक तक से आया जीव साधु एवं छठे नरक तक से आया जीव देशाविरत हो सकता है और सातवें नरक तक से आये जीव सम्यक्त्व को प्राप्त कर सकते हैं. परन्तु देशविरतित्व प्राप्त नहीं कर सकते हैं। अतः पंकप्रभा आदि से आया नारक जीव तीर्थरत्व को प्राप्त नहीं करता है। इसलिए तीर्थङ्करनामकर्म पंकप्रभा आदि तीन नरकों में अवन्ध्य होने से १०० प्रकृतियों का बन्ध समझला वाहिए।