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तृतीय कर्मग्रन्थ
(१३) संमी-अभिलाषा को संज्ञा कहते है और यह जिसके हो वह संशी कहलाता है । अथवा नोइन्द्रियावरण कर्म के क्षयोपशम को या तज्जन्य ज्ञान को संशा कहते है। यह जिसके को जागो संशी कहते हैं।' अथवा जिसके लब्धि या उपयोगरूप मन पाया जाये उसको संशी कहते हैं।
(१४) आहार....शरीर नामकर्म के उदय से देह, वचन और द्रव्यमान रूप बनने योग्य नोकर्मवर्गणा का जो ग्रहण होता है उसको आहार कहते हैं । अथवा तीन शरीर और छह पर्याप्तियों के योग्य पुद्गलों के ग्रहण को आहार कहते हैं।
मूल में मार्गणाओं के उक्त चौदह भेदों में से प्रत्येक मार्गणा के उत्तरभेदों की संख्या और नाम ५ यह है१ आहारादि विषयाभिलाषः संशति । .... सर्वार्थसिदि २१२४ २ गोइन्दिा पावरण खओक्सम तमनोहणं सशा। सा जस्मा सो दु सणणी इदरी सेसिदिय अचाहो ।
...गोर जीवाट १३. ३ संशिनः समानरकाः
...तत्त्वार्थ पुष २५२४ ४ भयाणां शरीराणां पश्यां पर्याप्तीमा प्रोग्य पुद्गल ग्रहगामाहारः ।
....... मार्थसिसि ३० ५ गुरनर तिरि भिरबगई इगबिलियच उपणिदि त्वया ।
भूजलजलणानिलवण तसा य अपवणस] जोगा। वेषमरिस्थिनपुसा कसाय कोह मयमायलो त । मइयवाहिमा केवल विहंगमइमुअनाण सामारा। सामायगरपरिहार
मुहमअहवायदेम असनमा । चवखूअनक्यूमोही केवलक्षण वाम किपहा नीला काऊ तेल पम्हा य मुक भवियरा वेधगबगुवसममिछमीमसासाया
सनियरे ।। आहारे अरभे.... .......
.............." --मातुर्थ कर्मग्रन्थ १०-१४
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