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वाचस्वामित्व १. गतिमार्गणा, २. इन्द्रियमार्गणा, ३. कायमार्गणा, ४. योगमार्गणा, ५, वेदमार्गणा, ६. कषायमार्गणा, ७. ज्ञानमार्गमा, ८. संयममार्गणा, ६. दर्शनमार्गणा, १०. लेश्यामार्गणा, ११. भव्यमार्गणा, १२. सम्यक्त्वमार्गणा, १३. संज्ञिमार्गणा, १४. आहारभार्गणा।'
इनके लक्षण इस प्रकार हैं
(१) गति--गति नामकर्म के उदय से होने वाली जीव की पर्याय को अथवा मनुष्य आदि चारों मतियों (भव) में जाने को गति कहते हैं।
(२) इन्द्रिय --आवरण कर्म का क्षयोपशम होने पर भी स्वयं पदार्थ का शान करने में असमर्थ शस्वभाव कप आन्मा को पदार्थ का शान कराने में निमित्तभूत कारण को इन्द्रिय कहते हैं । अथवा' जिसके द्वारा आत्मा जाना जाये, उसे इन्द्रिय कहते हैं। अथवा इन्द्र के समान
१ (क) गइन्दिर य कार जोए वार कमायनाणेस । संगमरमणलेसा भव सम्मे मषि आहारे 11
-चतुर्थ कर्मप्रन्यह (a) गहन्दियेसू काये जोगे वैदे कसाया य ___ संजमदसणलेस्सादिया सम्मत्त समिण आहार ।३
---रे जीवकांप ४१ २ अंणिश्य-तिरिवन-मणुस्सन्देक्षा णिच्चत्त कम्म त पदि गाम 1
ला १३३५, ५, १०११३६.३१६ ३ इन्दत्तीति इन्द्र आत्मा । सस्य शस्वभावस्य तदावरणश्योपशमे सति
स्वयमर्यान् गृहीतुमसमर्थस्य यदर्थोपलब्धिलिंग तदिन्द्रस्य लिगनिन्धियमित्युच्यते ।
-सर्विसिद्धि १११४ ४ आत्मनः सूक्ष्मस्थास्तिस्याधिगमे लिगमिन्द्रियम् ।
.. समिति ११४ ५ महमिदा जह देवा अधिससं अहमहं ति मध्यता ।
ईसंति एक्कमेकं इन्दा इछ इन्दियं जाणे !!