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अवस्थाओं को मार्गणा कहते हैं । अर्थात् जाहि व आसु न जीवा after जहा तहा दिट्ठा - जिस प्रकार से अथवा जिन अवस्था--- पर्यायों आदि में जीवों को देखा गया है. उनकी उसी रूप में विचारणा, गवेषणा करता मार्गणा कहलाता है।
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संसार में जीव अनन्त हैं । प्रत्येक जोन का बाह्य और आभ्यंतर जीवन अलग-अलग होता है। शरीर का आकार, इन्द्रियाँ, रंग-रूप, विचारrक्ति, मनोबल आदि farai में एक जीव दूसरे जीव से भिन है | यह भेद कर्मजन्य औदयिक, औtafts, क्षायोपशमिक और क्षायिक भावों के कारण तथा सहज पारिणामिक भाव को लेकर होता है | इन अनन्त भिताओं को ज्ञानियों ने ate free में faभाजित किया है। इन द विभागों के अवान्तर भेद ६२ हो । जीवों के बाह्य और आभ्यन्तर जीवन के इन विभागों को मार्गणा कहा जाता है ।
ज्ञानियों ने जीवों के आध्यात्मिक गुणों के विकासक्रम को ध्यान में रखते हुए, दुसरे प्रकार से भी चौदह विभाग किये हैं। इन विभागों को गुणस्थान कहते है ।
ज्ञानीजन जीव की मोह और अज्ञान की
अवस्था को निम्नतम अवस्था कहते हैं, और मोहरहित सम्पूर्ण ज्ञानावस्था की प्राप्ति को जीव की उच्चतम अवस्था अथवा मोक्ष कहते हैं । निम्नतम अवस्था से शनैः शनैः मोह के आवरणों को दूर करता हुआ जीव आगे बढ़ता है. और आत्मा के स्वाभाविक ज्ञान, दर्शन, चारित्र आदि गुणों का विकास करता है । इस विकास मार्ग में are ete अवस्थाओं में से गुजरता है । विकासमार्ग की इन श्रमिक अवस्थाओं को गुणस्थान कहा जाता है। इन क्रमिक असंख्यात अवस्थाओं को भी ज्ञानियों ने चौदह भागों में विभाजित किया है। इन चौदह विभागों को शास्त्रों गुणस्थान कहते हैं।
णा और गुणस्थान में अन्तर मार्गणा में किया जाने वाला