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________________ तृतीय कर्म ग्रन्थ : परिशिष्ट अविरत यहाँ पहले से चौथे गुणस्थान तक सत्तास्वामित्व मनुष्यगति मार्गणा के समान समझना चाहिए। १२८ दर्शन और अवशुदर्शन- इन दोनों मार्गणाओं में पहले से बारहवें गुणस्थान तक स्वामित्व मनुष्यगति मार्गणा के समान समझना चाहिए। अवधिवर्शन --- यहाँ अवधिज्ञानमार्गणा के अनुसार सत्तास्वामित्व समझता चाहिए । केवल दर्शन केवलज्ञानमार्गेणा के सद्दश्य सत्तास्वामित्व समझना चाहिए। YPALLA कृष्ण, नील और कापोत लेवा-तीन मार्गणात्रों में पहले से लेकर छठे गुणस्थान तक मनुष्यगति के अनुसार सत्तास्वामित्व समझना चाहिए। तेज और पद्म लेश्या - पहले से सातवें पुणस्थान तक मनुष्यगति के समान सत्तास्वामित्व समझना चाहिए। शुक्ला पहले से लेकर तेरहवं गुणस्थान तक मनुष्यगति के समान ससा समझना चाहिए । भव्य -- मनुष्यगति के समान सत्तास्वामित्व समझना चाहिए । अभव्य - सामान्य से और मिथ्यात्व गुणस्थान में जिननाम, जाहारकaare, area और मिश्रमोहनीय इस सात प्रकृतियों के बिना १४१ J प्रकृतियों की सता होती है । औपशमिक सम्यक्त्व. -- - चौथे से ग्यारहवें गुणस्थान तक मनुष्यगति के समान सत्ता समझना चाहिए । The arattern सम्यक्रव - इसमें चौथे से सातवें गुणस्थान तक मनुष्यगति के समान सत्ता समझना चाहिए । क्षायिक सम्यक्त्व - यहाँ अनन्तानुबन्धचतुष्क और दर्शनमोहनीय त्रिक इन सात प्रकृतियों के बिना सामान्य से १४१ प्रकृतियों की सत्ता होती है और चौथे से चौदह गुणस्थान तक मनुष्यगति के समान स्वामित्व समझना चाहिए । सास्वादन - यहाँ सामान्य से और दूसरे गुणस्थान में जिननाम के बिना १४७ प्रकृतियों की सत्ता होती है ।
SR No.090241
Book TitleKarmagrantha Part 3
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages267
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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