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द्वितीय कर्मग्रन्थ अर्थात् इनमें जीव का मरण नहीं होता है । १, २, ३, ५, और ११ ये पाँच गुणस्थान तीर्थंकर नहीं फरसते हैं । ४, ५, ६, ७, ८ इन पांच गुणस्थानों में ही जीव तीर्थकर गोत्र बांधता है । १२, १३ और १४ ये तीन गुणस्थान अप्रतिपाती हैं, अर्थात् आने के बाद नहीं जाते हैं । १. ४, ७, 5 ६. १० १२. १३ १४ इन नौ गुणस्थानों को मोक्ष जाने से पहले जीव' अवश्य फरसता है।'
इस प्रकार यहाँ संक्षेप में गुणस्थानों का स्वरूप कहा है । विस्तार से समझने के लिए अन्य ग्रन्थों का अभ्यास करना चाहिये।
प्रत्येक गुणस्थान में कर्मप्रकृतियों के बन्ध, उदय, उदीरणा, सत्ता की स्थिति का वर्णन करने के पूर्व अब मंगलाचरण में किये गये संकेतानुसार सर्वप्रथम बन्ध का लक्षण और प्रत्येक गुणस्थान में बन्धयोग्य कर्मप्रकृतियों का वर्णन करते हैं ।
अभिनयकम्मरगहणं, बंधो ओहेण तत्थ योस सयं । तित्थयराहारग-बुगवजं मिछमि सतर-सयं ॥३॥ गाथार्थ -नवीन कर्मों के ग्रहण को बन्ध कहते हैं। सामान्य से अर्थात् किसी खास गुणस्थान अथवा किसी जीव विशेष की विवक्षा किये बिना १२० कर्मप्रकृतियाँ बन्धयोग्य हैं । उनमें मे तीर्थङ्कर नामकर्म और आहारकद्विक के सिवाय शेष ११७ कर्मप्रकृतियों का मिथ्यात्व गुणस्थान में बन्ध होता है ।
विशेषार्थ · अभिनव-नवीन कर्मों के ग्रहण को बन्ध कहते हैं। जिस आकाश-क्षेत्र में आत्मा के प्रदेश हैं, उसी क्षेत्र में रहने वाले कर्मरूप सें परिणत होने की योग्यता रखने वाले पुद्गल स्कन्धों की वर्ग- . -- - १. प्रवचन द्वार २२४, गा० १३०२। प्रवचन द्वार ८९-६०, गापा ६६४.
७०० तथा बौद्ध गुणस्थान का थोकड़ा ।