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द्वितीय कर्मग्रन्थ
बाद वह जीव छठे और सातवें गुणस्थान में अनेक बार आता-जाता रहता है । बाद में आठवें गुणस्थान में होकर नौवें गुणस्थान को प्राप्त करके वहाँ चारित्रमोहनीयकर्म की शेष प्रकृतियों का उपशम प्रारम्भ करता है, जो इस प्रकार है - सबसे पहले नपुंसकवेद और उसके बाद क्रमशः स्त्रीवेद, हास्यादिषट्क (हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा), पुरुषवेद, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण क्रोधयुगल, संज्वलनक्रोध, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण मायायुगल, संज्चलन माया, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्यास्थानावरण लोभयुगल को तथा दसवे गुणस्थान में संज्वलन लोभ को उपशान्त करता है ।
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ग्यारहवें गुणस्थान की कालमर्यादा जघन्य एक समय और उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है ।
(१२) क्षीण - कषाय- वीतराग छद्मस्थ गुणस्थान - मोहनीय कर्म का सर्वथा क्षय होने के पश्चात् ही यह गुणस्थान प्राप्त होता है । इस गुणस्थानवर्ती जीव के भाव स्फटिकमणि के निर्मल पात्र में रखे हुए जल के समान निर्मल होते हैं। क्योंकि यहाँ मोहनीयकर्म सर्वथा क्षय हो जाता है, उसकी सत्ता भी नहीं रहती है ।
जो मोहनीय कर्म का सर्वथा क्षय कर चुके हैं, किन्तु शेष छद्म ( घातीकर्म का आवरण) अभी विद्यमान हैं, उनको क्षीण-कपाय -वीतराग छद्मस्थ कहते हैं और उनके स्वरूपविशेष को क्षीणकषाय-वीतराग छद्मस्थ गुणस्थान कहते हैं ।
इस बारहवें गुणस्थान के नाम में - ( १ ) क्षीणकषाय. ( २ ) वीतराग और ( ३ ) छद्मस्थ – ये तीनों व्यावर्तकविशेषण हैं। क्योंकि 'क्षीणकषाय' इस विशेषण के अभाव में 'वीतराग छदमस्य' इतने नाम से बारहवें गुणस्थान के सिवाय ग्यारहवें गुणस्थान का भी बोध होता है और क्षीणकषाय इस विशेषण को जोड़ लेने से बारहवें गुणस्थान