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________________ द्वितीय कर्मग्रन्थ (३) गुणधेणो जिन कर्मदलिकों का स्थितिघात किया जाता है, अर्थात् जो कर्मदलिक अपने-अपने उदय के नियत समयों से हटाये जाते हैं, उनको समय के क्रम से अन्तमुहर्त में स्थापित कर देना गुणश्रेणि कहलाती है। स्थापित करने का क्रम इस प्रकार है उदय-समय से लेकर अन्तर्मुहर्त पर्यन्त जितने समय होते हैं, उनमें से उदयाबलिका के समयों को छोड़कर शेष रहे समयों में से प्रथम समय में जो दलिक स्थापित किये जाते हैं, वे कम होते हैं 1 दूसरे समय में स्थापित किये जाने वाले दलिक पहले समय में स्थापित दलिकों से असंख्यातगणे अधिक होते हैं। इस प्रकार अन्तमुहूर्त के चरम समयपर्यन्त आगे-आगे के समय में स्थापित किये जाने वाले दलिक पहले-पहले के समय में स्थापित किये गये दलिकों से असंध्यातगणे ही समझने चाहिए। (४) गुणसंक्रमण ... पहले बंधी हुई अशुभप्रकृतियों को वर्तमान में बंध रही शुभप्रकृतियों में स्थानान्तरित कर देना, अर्थात् पहले बंधी हुई अशुभप्रकृतियों को वर्तमान में बँधने वाली शुभप्रकृतियों के रूप में परिणत कर देना गणसंक्रमण कहलाना है । मुणसंक्रमण का क्रम संक्षेप में इस प्रकार है प्रथम समय में अशुभप्रकृतियों के जितने दलिकों का शुभप्रकृति में संक्रमण होला है, उसकी अपेक्षा दुसरे समय में असंच्यातगुण अधिक दलिकों का संक्रमण होता है, तीसरे में दूसरे की अपेक्षा असंख्यातगुण । इस प्रकार जब तक गण-संक्रमण होता रहता है। तब तक पहले-पहले समय में संक्रमण किये गये दलिकों से आगे-आगे के समय में असंख्यातमुण अधिक दलिकों का ही संक्रमण होता है।
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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