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द्वितीय कर्मप्रन्थ
और अप्रमत्तसंयत की अपेक्षा विशुद्ध - गुण का अपकर्ष होता है। इस गुणरस्थान में ही चतुर्दश पूर्वधारी मुनि आहारकलब्धि का प्रयोग करते हैं।
प्रमत्तसंयत गुणस्थान की स्थिति जघन्य एकसमय और उत्कृष्ट करोड़ पूर्व से कुछ कम प्रमाण है और यह तथा इसम आगे के गुणस्थान मनुष्यगति के जीवों के ही होते हैं।
(७) अप्रमत्तसंयत गुणस्थान-जो संयत (मुनि) विकथा, कषाय आदि प्रमादों को नहीं सकते हैं, वे अप्रमतसं यत हैं और उनका स्वरूपविशेष जो ज्ञानादि गुणों की शुद्धि और अशुद्धि के तरतमभाव में होता है, अप्रमत्तसंयत्त गुणस्थान कहलाता है । अर्थात् जिसके संज्वलन और नोकषायों का मन्द उदय होता है और व्यक्ताव्यक्त प्रमाद नष्ट हो चुके हैं और ज्ञान, ध्यान, तप में लीन मकलसयम-मयुक्त संयत (मुनि) को अप्रमत्तसंयत कहते हैं।
प्रमाद के संबन से ही आत्मा गुणों की शुद्धि स गिरता है। इसलिए इस गुणस्थान से लेकर आगे के सभी गुणस्थानों में वर्तमान मुनि अपने स्वरूप में अप्रमत्त ही रहते है।
छठे प्रमत्तसंयत गुणस्थान और सातवे अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में इतना ही अन्तर है कि सातवें गुणस्थान में थोड़ा-सा भी प्रमाद नही होता है, इसलिए व्रतों में अतिचारादिक सम्भव नहीं हैं, किन्तु छठा गुणस्थान प्रमादयुक्त होने से व्रतों में अतिचार लगने की सम्भावना है । ये दोनों गुणस्थान गति-सूचक यन्त्र की सूई की तरह अस्थिर है। अर्थान कभी सातवें से छठा, कभी छटे मे सातवाँ गुणस्थान क्रमशः होते रहते हैं।
अप्रमत्तसंयत मुणस्थान की समयस्थिति जघन्य एक समय और उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त तक की होती है। उसके बाद वे अप्रमत्त मुनि या