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कर्मस्तव नहीं होती है । अतः ऐसी श्रेणीक्रम स्थिति बाले जीव निवृत्ति (अपूर्वकरण) नामक आठवे गुणस्थानवर्ती कहलाते हैं । ___ यद्यपि श्रेणी-आरोहण के कारण प्राप्त क्रमिक विशुद्धता के बढ़ने से जीव के कषायभावों में काफी निर्बलता आ जाती है। फिर भी उन कषायों में पुनः . होने की शक्ति बना रहता है । अत: ऐसे कषायपरिणाम वाले जीवों का बोध कराने के लिए आठवें के बाद नौवें अनिवृत्तिबादरसंपराय नामक गुणस्थान का कथन किया गया है।
नौवें गुणस्थानवी जीव के द्वारा प्रतिसमय कषायों को कृमा करने के प्रयत्न चालू रहते हैं और वैसा होने से एक समय ऐसी स्थिति आ जाती है, जब संसार की कारणभूत कषायों की एक झलक-सी दिखलाई देती है। इस स्थिति वाले जीव सूक्ष्मसंपराय नामक दसवें गुणस्थानवर्ती कहलाते हैं। __ जैसे झाई मात्र अतिसूक्ष्म अस्तित्व रखने वाली वस्तु तिरोहित अथवा नष्ट हो जाती है, बसे ही जो कषायवृत्ति अत्यन्त कृश हो गई है, उसके शान्त-उपशमित अथवा पूर्णरूप से नष्ट हो जाने से जीव को शुद्ध -निर्मल स्वभाव के दर्शन होते हैं। इस प्रकार शान्त (सत्ता में है) और नष्ट समूल क्षय)-इन दोनों स्थितियों को बतलाने के लिए क्रमशः ग्यारहवाँ उपशान्तमोह-वीतराग और बारहवां क्षीणमोह-वीतराग नामक गुणस्थान है । __मोहनीयकर्म के साथ-साथ ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मों का क्षय होने से जीव ने अनन्तज्ञान, दर्शन आदि अपने निज गुणों को प्राप्त कर लिया है। लेकिन अभी शरीरादि योगों का सम्बन्ध बना रहने से योगयुक्त वीतरागी जीव सयोगिकेवली नामक तेरहवें गुणस्थानवर्ती कहलाते हैं और जब शरीरादि योगों से रहित शुद्ध ज्ञान