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________________ द्वितीय कर्मग्रन्थ : परिशिष्ट १४५ बदले १४३, १४१ और १४० प्रकृतियों की सत्ता समझनी चाहिए । आहारकचतुष्क की सत्तावालों के इस गुणस्थान में सम्यक्त्वमोहनीय अवश्य सत्ता में होती है । अबद्धायुष्क अनेक जीवों की अपेक्षा १४७ की और एक जीव की अपेक्षा १४४ की तथा विसंयोजना करने वालों को क्रमशः १४३ की और १४० प्रकृतियों की सत्ता होता है। (२) आहारकचतुष्क की सत्तारहित मिश्र गुणस्थानवी जीवों में अनेक जीवों की अपेक्षा पूर्वबद्धायुष्क को १४३ की, अवद्धायुष्क को १४३ की तथा एक जीव की अपेक्षा बद्धायुष्क को १४० की तथा अबवायुष्क को भी १४० प्रकृतियों की सत्ता होती है। ___ पहले गुणस्थान में सम्यक्त्वमोहनीय की उद्वेलना करने के बाद मिश्रमोहनीय की उद्वेलना करके इस गुणस्थान में आये तो उसकी अपेक्षा एक-एक प्रकृति कम होती है। अर्थात् पहले जहाँ १४३ १४१ और १४० की सत्ता कही जाती है, वहां अनुक्रम से १४२. १४० और १३६ प्रकृतियों की गत्ता होती है । ___ अनन्तानुबन्धीकषायचतुष्क की विसंयोजना करने वाले को चार प्रकृतियाँ कम समझनी चाहिए । अर्थात् जहाँ १४३, १४१ और १४० की सत्ता कही गई है, वहीं अनुक्रम मे १३६, १३८ और १२ प्रकृनियों की सना होती है 1 सम्यक्त्वमोहनीय की मनारहित को अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना नहीं होती है। क्योंकि सम्यक्त्वमोहनीय की उद्वेलना मिथ्यात्व की सना रहने पर पहले गुणस्थान में ही होती है और वहाँ अनन्तानुबन्धी की बिसंयोजना नहीं होती है परन्तु वहाँ उस सत्ताहीन वाले के भी उसकी सत्ता होती है और मोमे जीव मिश्रमोहनीय की उद्देलना कर कदाचित मिश्र गुणस्थान में आते हैं और विसंयोजक तो ऊपर के गुणस्थान मे आते हैं और वहाँ मिथ्यात्व की सत्ता होने
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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