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प्रवर्तकधर्मवादियों, त्रिपुरुषार्थवादियों से नितान्त भिन्न है। वे मानते हैं कि पुनर्जन्म का कारण कर्म अवश्य है। शिष्ट-सम्मत एवं विहित कर्मों (कार्यों) के आचरण से स्वर्ग प्राप्त किया जा सकता है। किन्तु स्वर्ग की प्राप्ति वारने में ही सन्तोष मानना जीव का लक्ष्य नहीं है और न इसमें आत्मा के पुरुषार्थ की पूर्णता है। इसमें आत्मा के स्वतन्त्र, शुद्ध स्वरूप की उपलब्धि कहाँ है ? अतएव आत्मस्वरूप की उपलब्धि एवं पुरुषार्थ की पूर्णता के लिए अधर्म-पाप की तरह धर्मपुण्य भी हेय है। इनके अनुसार चौथा मोक्ष पुरुषार्थ स्वतन्त्र है और मोक्ष ही एकमात्र आत्मा का लक्ष्य है । मोक्ष के लिए पुण्यरूप या पापरूप दोनों प्रकार के कर्म के हैं। यही नहीं है दिई का उच्छेद नहीं किया जा सकता है। प्रयत्न के द्वारा कर्म का उच्छेद शक्य है । यह विचारधारा निवर्तकधर्म के रूप में प्रख्यात हुई। इसकी दष्टि सामाजिक व्यवस्था तक ही सीमित न होकर मुख्य रूप से व्यक्तिविकासवादी (आत्म-विकासवादी) है। व्यक्ति अपना विकास करके परम लक्ष्य की प्राप्ति अपने पुरुषार्थ के बल पर कर सकता है । निवर्तकधर्म का कर्म विषयक मंतव्य
निवर्तकधर्म के मन्तव्यानुसार आत्यन्तिक कर्मनिवृत्ति शक्य है और वह स्वयं आत्मा के प्रयत्नों द्वारा ही सम्भव होती है 1 कर्म की उत्पत्ति के मूल कारण का संकेत करते हुए कहा गया है कि धर्म-पुण्य और अधर्म --पाप के मूल कारण प्रचलित सामाजिक प्रवृत्ति-निवृत्ति, विधिनिषेध नहीं हैं, अपितु अज्ञान और राग-द्वेष हैं । कैसा भी शिष्ट-सम्मत सामाजिक आचरण क्यों न हो, अगर वह अज्ञान एवं राग-द्वेषमूलक है तो उससे अधर्म की ही उत्पत्ति होगी। पुण्य-पाप का यह भेद तो स्थूलदृष्टि वालों के लिए है। वस्तुतः पुण्य एवं पाप सत्र अज्ञान एवं राग-द्वेष मूलक होने से अधर्म एवं हेय हैं। इसलिए आत्मस्वातन्त्र्य