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________________ कमंस्तव ११८ प्रकृतियों की सत्ता का नाश हो जाता है । क्षय होने वाली प्रकृतियों के नाम ये हैं (१) देवगति, (२) देवानुपूर्वी, (३) शुभविहायोगति, (४) अशुभविहायोगति, (५) सुरभिगन्ध, (६) दुरभिगन्ध, (७) कर्कशस्पर्श, (६) मृदुस्पर्श, (६) लघुस्पर्श, (१०) गुरुस्पर्श, (११) शीतस्पर्श, (१२) उष्णस्पर्श, (१३) स्निग्धस्पर्श, (१४) रूक्षरपर्श, (१५) कृष्णवर्ण, (१६) नीलवर्ण, (१७) लोहितवर्ण, (१८) हारिद्रवर्ण, (१६) शुक्लवर्ण, (२०) कटुकरस, (२१) रिक्तरस, (२२) कषायरस, (२३) अम्लरस, (२४) मधुररस, (२५) औदारिक, (२६) वैक्रिय, (२७) आहारक, (२८) तेजस्, (२९) कार्मणशरीर, (३०) औदारिकबन्धन, (३१) वैक्रियबन्धन, (३२) आहारकबन्धन, (३३) तैजस-बन्धन, (३४) कार्मणबन्धन, (३५) मदारिकसंघातन, (३६) वैक्रिय - संघातन, (३७) आहारकसंघातन, (३८) तेजससंघातन, (३६) कार्मण संघातन, (४०) निर्माण, (४१) वज्रऋषभनाराचसंहनन, (४२) ऋषभनराचसंहनन, (४३) नाराचसंहनन, (४४) अर्धनाराच संहनन, (४५) कीलिकासंहनन, (४६) स्वातंसंहनन, (४७) अस्थिर, (४८) अशुभ, (४६) दुभंग, (५०) दु:स्वर, (५१) अनादेय, (५२) अयशः कीर्ति, (५३) समचतुरस्रसं स्थान, (५४) न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान, (५५) सादिसंस्थान (५६) वामनसंस्थान (५७) कुब्जसंस्थान (५८) हुंडसंस्थान, ( ५९ ) अगुरुलघु, (६०) उपघात, (६१) पराधात, (६२) उच्छ्वास (६३) अपर्याप्त, (६४) प्रत्येक, (६५) स्थिर (६६) शुभ, (६७) औदारिक अंगोपांग, (६८) वैक्रिय - अंगोपांग, (६६) आहारकअंगोपांग, ( ७० ) सुस्वर (७१) नीचगोल तथा ( ७२ ) साता या असाता वैदनीय में से कोई एक ।' १. इन प्रकृतियों में क्षेत्रविपाकी, जीवविपाकी और पुदुमलविपाकी प्रकृतियों का वर्गीकरण इस प्रकार करना चाहिए --
SR No.090240
Book TitleKarmagrantha Part 2
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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