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कर्मविपाक के साथ प्रत्येक के अन्त में कर्म शब्द जोड़ दने से उस कर्म का पूरा नाम हो जाता है। जैसे- ज्ञानावरणकर्म, दर्शनावरणकर्म इत्यादि ।
असंख्य कर्मप्रभावों को उक्त आठ भागों में वर्गीकृत करने का कारण यह है कि जिससे जिज्ञासुजन सरलता से कर्मसिद्धान्त को समझ सकें। ज्ञानावरणकर्म आदि आठ कर्मों के लक्षण क्रमशः इस प्रकार हैं
(१) जो कर्म आत्मा के ज्ञानगुण को आच्छादित करे, उसे ज्ञामा. वरणकर्म कहते हैं।
(२) जो कर्म आत्मा के दर्शनगुण को आच्छादित करे, उसे वर्शनावरणफर्म कहते हैं।
(३) जिस कर्म के द्वारा जीव को सांसारिक इन्द्रियजन्य सुख-दुःख का अनुभव हो, वह बेदनी पकर्म कहलाता है ।
(४) जो कर्म जीव को स्वपर-विवेक में तथा स्वरूपरमण में बाधा पहुंचाता है अथवा जो कर्म आत्मा के सम्यक्त्व और चारित्रगुण का घात करता है, उसे मोहनीयकर्म कहते हैं।
(४) जिस कर्म के अस्तित्व से जीव जीता है तथा क्षय होने से मरता है, उसे आधुकर्म कहते हैं।
(६) जिस कर्म के उदय से जीव नारक, तिर्यंच, मनुष्य, देव आदि नाम से सम्बोधित हो. उसे नामकर्म कहते हैं।
(७) जो कर्म जीव को उच्च, नीच कुल में जन्मावे अथवा जिस कर्म के उदय से जीव में पूज्यता, अपूज्यता का भाव उत्पन्न हो, जीव उच्च, नीच कहलाये उसे गोत्रकर्म कहते हैं। १ यदा कर्मणोमादाम विवक्षा गूयते शब्द्यने उच्चावर्ष: गवरात्मा यस्मात् कर्मणः उदयात गोत्र ।
-प्रमापना २३।१।२८८ रोका