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________________ ( ५० ) 1 वैशेषिक आदि कर्म को चेतननिष्ठ मानकर उसे चेतनधर्म बतलाते थे, जबकि प्रधानवादी सांख्ययोग उसे अन्तःकरण स्थित मानकर जड़धर्म बतलाते थे । परन्तु आत्मा और परमाणु को परिणामी मानने वाले जैन चिन्तक अपनी स्वतन्त्र प्रक्रिया के अनुसार कर्म को चेतन और जड़ उभय के परिणामरूप से उभयरूप मानते हैं । इनके मतानुसार बात्मा वेतन होकर भी सांख्य के प्राकृत अन्तःकरण की तरह संकोच विकासशील है, जिसमें कर्मरूप विकार भी सम्भव है और जो जड़ परमाणुओं के साथ एकरस भी हो सकता है। वैशेषिक आदि के मतानुसार कर्म चेतनधर्म होने से वस्तुतः चेतन से अलग नहीं और सांख्य के अनुसार कर्म प्रकृतिधर्म होने से वस्तुतः जड़ से पृथक नहीं, जबकि जैन चिन्तकों के मतानुसार कर्मतत्त्व चेतन और जड़ उभयरूप हो फलित होता है, जिसे वे भाव और द्रव्य कर्म कहते हैं । यह सब कर्मतत्त्व सम्बन्धी प्रक्रिया इतनी पुरानी तो अवश्य है, जबकि फर्म के चिन्तकों में परस्पर विचार-विनिमय अधिकाधिक होता था । वह समय : पुराना है यह निच तो नहीं कहा जा सकता, परन्तु जैनदर्शन में कर्मशास्त्र का जो चिरकालीन संस्थान है उस शास्त्र में जो विचारों की गहराई, श्रृंखलाबद्धता तथा सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाषों का असाधारण निरूपण है, उसे ध्यान में रखने से यह बिना माने काम नहीं चलता कि जैनदर्शन की विशिष्ट कर्मविद्या भगवान पार्श्वनाथ के पहले अवश्य स्थिर हो चुकी थी। इसी विद्या के कारण जैन कर्मशास्त्रज्ञ कहलाये और यही विद्या अग्रायणीयपूर्व तथा कर्मप्रवादपूर्व के नाम से वित हुई । जैन चिन्तकों ने कर्म-तत्व के चिन्तन की ओर बहुत ध्यान दिया, जबकि सांख्ययोग ने ध्यानमार्ग की ओर सविशेष ध्यान दिया । अगे जाकर जब तथागत बुद्ध हुए, तब उन्होंने भी ध्यान पर ही अधिक भार दिया । पर सबों ने विरासत में मिले कर्मचिन्तन का रूप अपना रखा है। यही कारण हैं कि सूक्ष्मता और विस्तार में जैन कर्मशास्त्र अपना असाधारण स्थान रखता है । फिर भी सांख्ययोग, बौद्ध आदि दर्शनों के कर्म-चिन्तकों के साथ उसका बहुत कुछ साम्य है और मूल में एकता भी है जो कर्मशास्त्र के अभ्यासियों के लिए ज्ञातव्य है ।
SR No.090239
Book TitleKarmagrantha Part 1
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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