________________
इन कर्मवादियों के भी मुख्य दो दल रहे हैं। एक तो यह प्रतिपादित करता था कि कर्म का फल जन्म-जन्मान्तर और परलोक अवश्य है, परन्तु श्रेष्ठ जन्म और अंग्छ परलोक के वास्ते कर्म भी श्रेष्ठ होना चाहिए। यह दल परलोकवादी होने से तथा स्वर्ग को श्रेष्ठलोक मानने वाला होने और उसके साधन रूप में धर्म का प्रतिपादन करनेवाला होने से धर्म, अर्थ, काम ऐसे तीन ही पुरुषार्थों को मानता था। उसकी प्टि मॉने का अलग पूरबार्य रूप स्थान न था।
जहाँ कहीं प्रवर्तकधर्म का उल्लेख आता है, वह इसी त्रिपुरुषार्थवादी दल के मनम का सूचक है। यह दल सामाजिक व्यवस्था का समर्थक था, अतएव वह समाजमान्य. शिष्ट एवं निहित आचरणों में धर्म की उत्पत्ति तथा निध आचरणों से अधर्म की उत्पत्ति बतलाकर एक तरह की सामाजिक सुव्यवस्था का ही संकेन करता था। यही दल बाह्मणमार्ग. मीमांसक और कर्मकाण्डी नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसका मन्तव्य संक्षेप में इस प्रकार है:
धर्म-शुभकर्म का फल स्वर्ग और अधर्म-अशुभकर्म का फल नरक आदि हैं । धर्माधर्म ही पुण्य-पाप तथा अदृष्ट कहलाते हैं और उन्हीं के द्वारा जन्म-जन्मान्तर की चक्रप्रयत्ति चलती रहती है, जिसका उच्छेद शक्य नहीं है। यदि शक्य है, लो इतना कि अगर अच्छा लोक और अधिक सुख पाना है तो धर्म ही कर्तव्य है । इस मत के अनुसार अधर्म वा पाप तो हेय है परन्तु धर्म या पुण्य हेय नहीं। ___ कर्मवादियों का दूसरा दल उपयुक्त दल से सर्वथा विरुद्ध दृष्टि रखने वाला था। वह मानता था कि पुनर्जन्म का कारण कर्म अवश्य है। शिष्ट, सम्मत एवं विहित कर्मों के आचरण से धर्म उत्पन्न होकर स्वर्ग भी देता है, परन्तु वह धर्म भी अधर्म की तरह ही सर्वथा हेय है । इसके मतानुसार एक चौथा पुरुषार्थ भी है, जो मोक्ष कहा जाता है । इसका कथन है कि एक मात्र मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है और मोक्ष के वास्ते कर्ममात्र, चाहे वह पुण्यरूप हो या पापरूप-हेय है । यह नहीं कि कर्म का उच्छेद शक्य न हो। प्रयत्न से वह भी शक्य है ।
जहाँ कहीं भी निवर्तक धर्म का उल्लेख आता है, वहाँ सर्वष इसी मत का