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________________ कर्म का भोग और परकृत कर्म के भोग का अभाव तभी घट सकता है, जबकि आत्मा न तो एकान्त नित्य माना जाए और न एकान्त क्षणिक । भौतिकवादी आज की तरह उस समय भी थे। वे भौतिक देह नष्ट होने के बाद कृतकर्म-भोगी पुनर्जन्मबाग कि स्थायी काम को नहीं मानते : यह दृष्टि बहुत ही संकुचित थी, जिसका कर्मसिद्धान्त के द्वारा निराकरण किया गया। कर्मसिद्धान्त-विचार : ऐतिहासिक समीक्षा जनदर्शन में कर्मतत्व के विवेचन को अनादि माना है । जैन इसका समर्थन वैसे ही करते आये हैं, जैसे मीमांसक वेदों के अनादित्व की मान्यता का करते हैं। बुद्धि-अप्रयोगी और बुद्धि-प्रयोगी दोनों प्रकार के श्रद्धालु मानते आये हैं और बुद्धिप्रयोगी तो श्रद्धा से मान ही नहीं लेते किन्तु उसका बुद्धि के द्वारा यथासम्भव समर्थन भी करते हैं। उक्त दृष्टि से कर्मतस्य की विचारणा का महत्त्व तो है ही, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से भी विचार किया जाना उतना ही महत्त्वपूर्ण है। ऐतिहासिक दृष्टि से कमतत्त सम्बन्धी विचार परम्परा की श्रृंखला में पहला प्रपन है कर्मतत्त्व मानना या नहीं और मानना तो किस आधार पर । एक पक्ष ऐसा था जो काम और उसके साधन रूप अर्थ के सिवाय अन्य कोई पुरुषार्थ ही नहीं मानता था। उसकी दृष्टि में इलोक ही पुरुपार्थ है । अतएव वह ऐसा कोई कर्मसत्त्व मानने के लिए बाध्य नहीं था जो अच्छे-बुरे जन्मान्तर या परलोक की प्राप्ति करानेवाला हो। यह पक्षा चार्वाक के नाम से विख्यात हा । परन्तु उस पुराने युग में ऐसे भी चिन्तक थे, जो बतलाते थे कि मृत्यु के बाद जन्मान्तर भी है । इतना ही नहीं, इस दृश्यमान लोक के अलावा अन्य श्रेष्ठ और कनिष्ठ लोक भी हैं । वे पुनर्जन्म और परलोकवादी कहलाते ये और वे पुनर्जन्म और परलोक के कारणरूप में कर्मतत्त्व को स्वीकार करते थे । इनकी दृष्टि रही कि अगर काम न हो तो जन्म-जन्मान्तर एवं इहलोकपरलोक का सम्बन्ध घट ही नहीं सकता। अतएव पुनर्जन्म की मान्यता के आधार पर कर्मतत्त्व को स्वीकार करना आवश्यक है। ये ही कर्मवादी अपने को परलोकवादी तथा आस्तिक कहते थे ।
SR No.090239
Book TitleKarmagrantha Part 1
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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