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विषय है, लेकिन कर्मशास्त्र में भी प्रसंगवश ऐसी अनेक बातों का वर्णन किया गया है, जोकि शरीर से सम्बन्ध रखती हैं।
कर्मसिद्धान्त में शरीर सम्बन्धी बातें चाहे पुरातन पद्धति से कही गई हैं। लेकिन इतने मात्र से उनका महत्त्व कम नहीं हो जाता है । मुख्य रूप से यह देखना है कि कर्मशास्त्र में भी शरीर की बनावट, उसके प्रकार, उसकी मजबूती और उसके कारणभूत तत्वों का व्यवस्थित रीति से कथन किया गया है और उनकी शोध करके नवीनता भी लायी जा सकती है और शास्त्र की महत्ता भी सिद्ध की जा सकती है। __ भाषा-शास्त्र-इसी प्रकार कर्मशास्त्र में भाषा व इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी विचारणीय चर्चा मिलती है । भाषा किस तत्त्व से बनती है, उसके बनने में कितना समय लगता है। उसकी रचना के लिए नाना जपलो पनि का क्रिम तरह प्रयोग करती है और किस साधन द्वारा करती है । भाषा की सत्यता, असत्यता का आधार क्या है ? कौन-कौन प्राणी भाषा बोल सकते हैं ? किस जाति के प्राणी में किस प्रकार की भाषा बोलने की शक्ति है इत्यादि भाषा सम्बन्धी प्रश्नों का महत्वपूर्ण व गम्भीर विचार कर्मशास्त्र में विशद् रीति से किया हुआ मिलता है।
इसी प्रकार इन्द्रियां कितनी हैं, कैसी हैं, उनके कैसे-नौसे भेद और कैसीकैसी शक्तिपां हैं? किरा-किस प्राणी को कितनी-कितनी इन्द्रियाँ प्राप्त हैं ? वाद्य और आभ्यन्तरिक इन्द्रियों का आपस में क्या सम्बन्ध है, इनका कैसाकैसा आकार है, इत्यादि इन्द्रियों से सम्बन्ध रखने वाले अनेक प्रकार के विचार कर्मशास्त्र में पाये जाते हैं ।
यह हो सकता है कि ये सब विचार उसमें अमन नहीं भी मिलने हों किन्तु यह ध्यान में रहे कि कर्मशास्त्र का मुख्य प्रतिपाद्य विषम और ही है और उसी के वर्णन के प्रसंग में शरीर, भाषा, इन्द्रिय आदि का विचार आवश्यकतानुसार किया गया है । इसलिए संभवतः व्यवस्थित संकलना न हो पाई हो, तो भी इससे कर्मशास्त्र की त्रुटि सिद्ध नहीं होती है, बल्कि इसको तो अनेक शास्त्रों के विषय की चर्चा करने का गौरव ही कहा जाएगा।