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________________ १४७ प्रद्वेष - द्वेष, अरुचि, ईर्ष्या, अन्तअवर्णवाद - ये ज्ञानावरण और विशेष कारण हैं। इनके लक्षण क्रमशः प्रथम कर्मग्रन्थ 1 प्ररूपणा करना, उपघात – विनाश, राय - विरून, आसातना - निन्दा, दर्शनावरण कर्मों के बन्ध के इस प्रकार हैं (१) ज्ञान, ज्ञानी और ज्ञान के साधनों के प्रतिकूल आचरण करना प्रत्यनीकत्व कहलाता है । (२) मानवा ज्ञानदाता गुरु का नाम छिपाना, अमुक के पास पह कर भी मैंने इनसे नहीं पढ़ा अथवा अमुक विषय को जानते हुए भी मैं नहीं जानता - उत्सूत्र प्ररूपणा करना, इस प्रकार के अपलाप को निन्द्रव कहते हैं । पुस्तक पठणला आदि का शस्त्र, अग्नि आदि से नाश कर देना उपघात है । (३) ज्ञानियों और ज्ञान के (४) ज्ञानियों और ज्ञान के साधनों पर प्रेम न रखकर द्वेष रखना अरुचि रखना प्रदेष हैं। (५) ज्ञानाभ्यास के साधनों में रुकावट डालना, विद्यार्थियों को विद्या, भोजन, वस्त्र, स्थान आदि का लाभ होता हो तो उसे न होने देना, विद्याभ्यास छुड़ाकर उनसे अन्य काम करवाना अन्तराय कहलाता है । (६) ज्ञानियों की निन्दा करना उनके बारे में झूठी झूठी बातें कहना या मर्मच्छेदी बातें लोक में फैलाना, उन्हें मार्मिक पीड़ा हो, ऐसा कपट - जाल फैलाना आसानना है । पूर्वोक्त कार्यों के सिवाय निषिद्ध काल स्थान आदि में अभ्यास करना, गुरु का विनय न करना, पुस्तकों आदि को पैरों से हटाना, पुस्तकों का सदुपयोग न होने देना आदि तथा इसी प्रकार के अन्य कारण व कार्यों
SR No.090239
Book TitleKarmagrantha Part 1
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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