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________________ कर्मविपाक धर्म-सिद्धान्तों पर द्वेष और उससे विपरीत सिद्धान्तों पर राग होता है । मिथ्यात्व के बस भेद को साधु न समझना । (१) साधु (२) असाधु को साधु समझना । (३) अहिंसामूलक धर्म को धर्म नहीं मानना । (४) हिंसा, झूठ आदि अधर्म - पापमूलक कार्यों को धर्म मानना । जिन कृत्यों या विचारों में आत्मा की अधोगति होती है, वह अधर्म है । ७६ (५) अजीव को जीव समझाना | (६) जीव को अजीत रामझना ना ना पक्ष ज वनस्पति आदि मुक आदि प्राणियों में आत्मा नहीं है। (७) कुमार्ग को सन्मार्ग समझना । अर्थात् आत्मा को संसार में परिभ्रमण कराने वाले कारणों को अच्छा मानना । केवलरूपित मार्ग से विपरीत प्ररूपणा सही मानना । (८) सुमार्ग को उन्मार्ग समझना, अर्थात् मोक्ष के कारणों को संसारबंध के कारण कहना | (2) कर्मरहित को कमसहित मानना । जैसे परमात्मा निष्कर्म हैं, किन्तु उन्हें भक्तों की रक्षा और दैत्यों का नाश करने वाला कहना । १. दसविहे मिच्छते पण तं जड़ा - अधम्मं अम्मण्णा धम्मे अबम्म सण्णा, अमरगे मरगमण्णा, मग्गे उम्मभासण्णा, अजीवसृ जीवसण्णा, जीवेसृ अजीवसुण्णा, असा साहस, साहस असा सण्णा, अमुत्तेस मुत्तण्णा, मुस् अमुससण्णा । - स्वामांग १० सूत्र ७३४
SR No.090239
Book TitleKarmagrantha Part 1
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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