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________________ ७. इच्छानुकूलिका ८. अनभिग्रहिता ९. अभिप्रहिता १०. सन्देहकारिणी ११. व्याकृता -- -- -- सत्पदप्ररूपणाद्वार अपनी पसन्द को व्यक्त करना । असहमति की भाषा • अनुमोदन या स्वीकृति की भाषा । अस्पष्ट भाषा, यह सैन्धव अच्छा है। सैन्धव का अर्थ नमक तथा घोड़ा दोनों होता है। इससे वक्ता का सैन्धव से क्या आशय है यह स्पष्ट नहीं हो पाता है। ४५ — — किसी नये तथ्य को उद्घाटित नहीं करते हैं, जो पुनरावृत्ति रूप हैं। जहाँ स्पष्टतः विधि - निषेध की स्थिति न बन पाये । वे कथन १२. अव्याकृता भाषा के यह १२ प्रकार न सत्य हैं न मृषा है अतः इन्हें असत्य - अमृषा भाषा कहा गया। असत्य अमृषा मनोयोग में यह भाव अन्तरंग में रहते हैं। भाषा रूप परिणमित होने पर इन्हें वचनयोग में (असत्य - अमृषा ) में लिया जाता है। अब काय योग के ७ प्रकार बताये जाते हैं : १. औदारिक कायद्योग औदारिककाय विषयक योग औदारिक काययोग २. औदारिक मिश्र काययोग — औदारिक शरीर बनने से पूर्व अपर्याप्तावस्था में पाये जाने वाले कार्मण शरीर का संयोग औदारिक मिश्र काययोग कहलाता है। ३. वैकिय काययोग- वैक्रिय शरीर विषयक योग वैक्रिय काययोग है। वैक्रियमिश्र काययोग - वैक्रिय शरीर की अपर्याप्तावस्था में पाया जाने वाला कार्मणशरीर का योग वैक्रियमिश्र काययोग कहलाता है। ४. ५. आहारक काययोग - आहारक शरीरविषयक योग को आहारक काय योग कहते हैं। ६. आहारकमिश्र काययोग- आहारक शरीर की अपर्याप्तावस्था में : औदारिक काय का संयोग आहारकमिश्र काययोग है। : ७. कार्मण काययोग - अष्ट कर्मों का समूह कार्मण काययोग है। कार्मण काय विषयक योग विग्रहगति में तथा केवलीसमुद्घात में होता है। नोट:-- कार्मण तथा तेजस् शरीर सदा साथ रहते हैं अतः तेजस् काययोग का अलग से वर्णन नहीं किया गया है।
SR No.090232
Book TitleJivsamas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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