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________________ xxxii जीवसमास के तुलनात्मक अवतरण देकर यह बताया है कि महाकम्मपडिपाहुड का विषय बहुत विस्तृत था, और वह संक्षेप रूप से कण्ठस्थ रखने के लिए गाथा रूप 4 प्रथित या गुम्फित होकर आचार्य-परम्परा से प्रवहमान होता हुआ चला आ रहा था, उसका जितना अंश आचार्य शिवशर्म को प्राप्त हुआ, उसे उन्होंने अपनी 'कम्मपयडी-संग्रहणी' में संग्रहित कर दिया। इसी प्रकार उनके पूर्ववर्ती जिस आचार्य को जो विषय अपनी गुरु परम्परा से मिला, उसे उन-उन आचार्यों ने उसे गाथाओं में गुम्फित कर दिया, ताकि उन्हें जिज्ञासु जन कण्ठस्थ रख सकें। समस्त उपलब्ध जैन वाङ्मय का अवलोकन करने पर हमारी दृष्टि एक ऐसे अन्य पर गई, जो पट्खण्डागम के प्रथम खण्ड जीवस्थान के साथ रचना शैली से पूरी-पूरी समता रखता है और अद्यावधि जिसके कर्ता का नाम अज्ञात है, किन्तु पूर्वभृत्-सूरि-सूत्रित के रूप में विख्यात है, उसका नाम है जीवसमासा इसमें कल २८६ गाथाएँ है और सत्प्ररूपणा, द्रध्यप्रमाणानुगम आदि उन्हीं आठ अनुयोगद्वारों में जीव का वर्णन ठीक उसी प्रकार से किया गया है, जैसाकि षट्खण्डागम के जीवस्थान नामक प्रथम खण्ड में। भेद है, तो केवल इतना ही, कि आदेश से कथन करते हुए जीवसमास में एक-दो मार्गणाओं का वर्णन करके यह कह दिया गया है कि इसी प्रकार से धीर, वीर और श्रुतज्ञजनों को शेष मार्गणाओं का विषय अनुमार्गण कर लेना चाहिए। तब षट्खण्डागम के जीवस्थान में उन सभी मार्गणा स्थानो का वर्णन खूब विस्तार के साथ प्रत्येक प्ररूपणा में पाया जाता है। यही कारण है कि यहां जो वर्णन केवल २८६ गाथाओं के द्वारा किया गया है, वहाँ वहीं वर्णन जीवस्थान में १८६० सूत्रों के द्वारा किया गया है। जीवसमास में आठों प्ररूपणाओं का ओध और आदेश से वर्णन करने के पूर्व उस-उस प्ररूपणा की आधारभूत अनेक बातों की बड़ी विशद चर्चा की गई है, जो कि जोवस्थान में नहीं है। हाँ, धवला टीका में वह अवश्य दृष्टिगोचर होती है। ऐसी विशिष्ट विषयों की चर्चा वाली सब मिलाकर लगभग १११ गाथाएँ हैं। उनको २८६ में से पटा देने पर केवल १७५ गाथाएँ ही ऐसी रह जाती हैं, जिनमें आठों प्ररूपणाओं का सूत्ररूप में होते हुए भी विशद एवं स्पष्ट वर्णन पाया जाता है। इसका निष्कर्ष यह निकला कि १७५ गाथाओं का स्पष्टीकरण षद्खण्डागमकार ने १८६० सूत्रों में किया है। यहाँ यह शंका की जा सकती हैं कि सम्भव है षखण्डागम के उक्त जीवस्थान के विशद एवं विस्तृत वर्णन का जीवसमासकार ने संक्षेपीकरण किया हो। जैसा कि धवला-जयधवला टीकाओं का संक्षेपीकरण गोम्मटसार के रचयिता
SR No.090232
Book TitleJivsamas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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