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________________ परिमाण-द्वार १३५ जीव)। छठे वर्गमूल २६४ से भाग देने पर आने वाला भागफल २४०३२ (पाँचवी नरक के जीव)। तीसरे वर्गमूल २५१२ से भाग देने पर आने वाला भागफल २३५८४ (छठों नरक के जीव)। दूसरे वर्गमूल २१०२४ से भाग देने पर आने वाला भागफल २३०७२ (सातवीं नरक के जीव)। ग्यारहवें वर्गमूल २२ से भाग देने पर आने वाला भागफल २४०१४ (तीसरा-चौथा देवलोक)। नवमें वर्गमूल २८ से भाग देने पर आने वाला भागफल २४०८८ (पाँचवा देवलोक)। सातवाँ वर्गमूल २३२ से भाग देने पर आने वाला भागफल २४०६४ (छठाँ देवलोक}। पाँचवा वर्गमूल २१२८ से भाग देने पर आने वाला मागफल २३९६८ (सातवाँ देवलोक )। चौथा वर्गमूल २२५६ से भाग देने पर आने वाला भागफल २३८४३ (आठवाँ देवलोक)। एकेन्द्रिय जीवों का परिमाण बायरपुडवी आऊ पत्तेयवसई य पज्जत्ता । तेय पपरभवहरिज्जंसु अंगुलासंखभागेणं ।। १५९।। गाथार्थ- पर्याप्त बादर पृथ्वीकाय, अपकाय तथा वनस्पतिकाय यं तीनां राशियाँ प्रतर का अपहार करने लगे तो अंगुल के असंख्यातधे भाग परिमाण प्रतर का अपहरण करते हैं। विवेचन-उपर्युक्त तीनों ही राशियाँ मिलकर एक समय में प्रत्येक एक-एक प्रतर-प्रदेश का अपहार कर असत्कल्पना से दूसरे स्थान पर रखें, फिर दूसरे समय अन्य स्थान पर रखें ऐसे ही तीसरे, चौथे समय में यावत् अंगुल के असंख्यातवे भाग रूप आकाश-प्रदेश पर रखें, उससे श्रेणी-खण्ड में जितने प्रदेश होते हैं उतने समय में वे समस्त प्रतर का अपहार करते हैं। अथवा- अंगुल के असंख्यातवें भाग रूप आकाश-प्रदेश की श्रेणी-खण्ड में जितने प्रदेश हैं उनसे सम्पूर्ण प्रतर-प्रदेश की राशि का भाग करने पर जो प्रतर-प्रदेश खण्ड भागाकार रूप आया हो उसमें जितने प्रदेश है उतने प्रदेश परिमाण बादर पर्याप्त पृथ्वोकाय होते हैं। . अथया समस्त बादर पर्याप्त पृथ्वीकाय को अंगुल का असंख्यातवां भाग रूप प्रतर-प्रदेश-खण्ड दें तो एक साथ एक समय में सम्पूर्ण प्रतर का अपहार करते हैं। इन तीनों विकल्पों में जैसे पृथ्वीकाय के प्रमाण का विचार किया है वैसे ही अप्काय व वनस्पतिकाय का भी विचार करना चाहिए क्योंकि गाथा में तीनों का निर्देश किया गया है, फिर भी अंगुल के असंख्यात भाग के असंख्य भेद
SR No.090232
Book TitleJivsamas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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