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________________ जीवसमास का ग्रहण तो हुआ परन्तु अजीव द्रव्य रह गया। इसलिए यह नय विशेष संग्रह नय हैं। (रत्नाकरावतारिका- अध्याय ७)। (३) व्यवहार नय- लौकिक व्यवहार के अनुसार विभाग करने वाले नय को व्यवहार नय कहते हैं जैसे जो सत् है- वह या तो द्रव्य है या पर्याय। जो द्रव्य है उसके जीवादि छः भेद है। जो पर्याय है उसके सहभावी और क्रमभावों ये दो भेद हैं। इसी प्रकार जीव के संसारी और मुक्त ऐसे दो भेद हैं। सब द्रव्यो और उनके विषयों में प्रवृत्ति करने वाले नय को व्यवहार नय कहते हैं। यह नय सामान्य को नहीं केवल विशेष को हो ग्रहण करता है क्योंकि सामान्य लोक व्यवहार का विषय नहीं है। लोक में तो विशेष घटादि पदार्थ जलधारण आदि क्रियाओं के योग्य देखे जाते है। यद्यपि निश्चय नय के अनुसार घट आदि सब अष्टस्पर्शी पौदगलिक वस्तुओं में पाँचवर्ण, दो गन्ध, पाँच रस तथा आठ स्पर्श होते हैं किन्तु बालक और स्त्रियाँ जैसे साधारण लोग एक वस्तु में काले या नीले वर्ण विशेष का ही निश्चय करते हैं, उसी का लोक व्यवहार के योग्य होने के कारण वे सत् रूप से प्रतिपादन करते हैं और शेष का नहीं। जैसे मोगा माली है। व्यवहार से कोयल काली है परन्तु निश्चय से कोयल मे पाँच वर्ण, दो गन्ध, पाँच रस और आठ स्पर्श पाये जाते हैं। इसी प्रकार नरम गुड़ व्यवहार से मीठा है परन्तु निश्चय नय से उसमें उपरोक्त पाँचो रस आदि पाये जाते हैं। यह नय प्राय: उपचार में ही प्रवृत्त हआ करता है इसके ज्ञेय विषय अनेक होते हैं, इसलिए इसको विस्तृतार्थ भी कहा गया है। यह लोक प्रचलित वचन व्यवहार को ही सत्य मान लेता है जैसे- घड़ा चूता है, नाला गिरता है, रास्ता चलता है, बनारस आ गया। वस्तुत: घड़े में परा हुआ पानी व्रता है, नाला नहीं पर नाले में से पानी गिरता हैं, रास्ते में मनुष्य चलते हैं तथा बनारस नहीं आतामनुष्य बनारस पहुँचता है फिर भी लौकिक जन इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते है। इस प्रकार प्राय: व्यवहार-नय की प्रवृत्ति उपचरित विषय ही हैं। व्यवहार नय के दो भेद हैं- (१) सामान्य भेदक, (२) विशेष भेदक। सामान्य संग्रह में भेद करने वाले नय को सामान्य भेदक व्यवहार नय कहते हैं जैसे द्रव्य के दो भेद हैं... जीव और अजीव। विशेष संग्रह में भेद करने वाला विशेष भेदक व्यवहार नय है जैसे जीव के दो भेद- संसारी और मुक्त। (४) अगसन नय-वर्तमान क्षण में होने वाली पर्याय विशेष को ही प्रधान रूप से ग्रहण करने वाले नय को ऋजुसूत्र नय कहते हैं जैसे मैं सुखी हूँ। यह वर्तमान क्षण स्थायी सुखपर्याय को प्रधान रूप विषय देता है। (रत्नाकरावतारिका,
SR No.090232
Book TitleJivsamas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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