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________________ परिमाण-द्वार इनको मिलाकर फिर सर्वराशि का तान बार वर्ग करके उस राशि में केवलद्विक (केवलदर्शन, केवलज्ञान) की अनन्त पर्यायां का प्रक्षेपण करने पर उत्कृष्ट अनन्तानन्त राशि का परिमाण होता है। गणन संख्या का सक्षिप्त प्रारूप इस प्रकार है। (९) त्रिविध संख्यात जघन्य मध्यम (२) नवविथ असंख्यात परीत असाव्यात अक्त-असख्यात असख्यान-अमख्यात १. जघन्य परीत-असरल्यात ४. जघन्य जन-असंग्मात ७. जघन्य असख्यान-असंण्यात २. मध्यम परीत-असख्यात ५. मध्यम यत्त- असंगत ८. मध्यन असंख्यात-असंग्न्यात ३. उत्कृष्ट पीत-असख्यान ६. उत्कृष्ट युक्त-असंख्यात ९. उत्कृष्ट अमत्र्यात-असंख्यात (३) अष्टविध अनन्त परीत-अनन्त युक्त-अनन्त अनन्त-अनन्त १. जघन्य परीत-अनन्त जघन्य युक्त-अनन्त जघन्य अनन्त-अनन्त २. मध्यम परीत-अनन्त मध्यम युक्त-अनन्त मध्यम अनन्त-अनन्न ३. उत्कृष्ट परीत-अनन्त उत्कृष्ट युक्त- अनन्त गाथा १३४ के अनुसार गुण तथा नोगुण के दो प्रकारो में से गुण निष्पन्न वर्ण आदि की चर्चा की तथा नोगुण निष्पत्र संख्या में श्रत तथा गणित संख्या की चर्चा हुई अब नो संख्या की चर्चा करते है। नोसंखाणं नाणं दमण चरणं नयप्पमाणं च ।। पंच चउ पंच पंच य जहाणुपुचीए नायव्या ।।१४०।। गाथार्थ-नोसंख्या के शान, दर्शन, चारित्र तथा नयप्रमाण ये चार भेद है। इनके यथाक्रम से पांच, चार, पांच तथा पांच मंद जानना चाहिए। ज्ञान-प्रमाण पच्चरखं न परोक्खं नाणपमाणं समासओ दुविहं। पच्चमोहिमणकेवलं च पारोस्ख मइसुत्ते ।।१४१।। गाथार्थ-ज्ञान-प्रमाण संक्षेप से प्रत्यक्ष और परोक्ष दो प्रकार का है प्रत्यक्ष के अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये तीन प्रकार तथा परोक्ष के
SR No.090232
Book TitleJivsamas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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