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________________ जीवसमास १. परीसानन्त निरूपण-(१) जघन्य परीतामन्त- जघन्य-असंख्यात राशि को उसी जघन्य असंख्यात-असंख्यात राशि से परस्पर अभ्यास रूप में गुणित करने पर प्राप्त परिपूर्ण जघन्य परीतानन्त का परिमाण है अथवा उत्कृष्ट असंख्यातअसंख्यात में एक (रूप) का प्रक्षेपण करने से भी जघन्य परांतानन्त का प्रमाण होता है। (२) मध्यम परीतानन्त- उत्कृष्ट परीतानन्त के प्राप्त न होने के पूर्व की राशि मध्यम परीतानन्त होती है। (३) उत्कृष्ट परीतानन्त- जघन्य परीतानन्त को जवन्य परीतानन्त से परस्पर अभ्यास रूप गुणित करके उसमें से एक कम करने से उत्कृष्ट परीतानन्त की संख्या बनती हैं। २. युक्तानन्त निरूपण--(५; जघन्यः सीताना राशि उसी राशि अभ्यास करने पर प्रतिपूर्ण संख्या जघन्य युक्तानन्त है अथवा उत्कृष्ट परीतानन्त में एक राशि (अंक) प्रक्षिप्त करने से एक अधन्य युक्तानन्त होता है। अभव्य जीव भी जघन्य युक्तानन्त जितने होते हैं। (२) उसके पश्चात् मध्यम युक्तानन्त राशि है और वह राशि उत्कृष्ट युक्तासन्त के पूर्व तक है। (३) जघन्य युक्तानन्त राशि के साथ अभव सिद्धिक (अभव्य) राशि का परस्पर अभ्यास रूप गुणाकार करके प्राप्त संख्या में से एक न्यून करने पर प्राप्त राशि उत्कृष्ट युक्तानन्त है अथवा एक न्यून जघन्य अनन्तानन्त उत्कृष्ट युक्तानन्त हैं। ३. अनन्त-अनन्त निरूपण-(१) जघन्य युक्तानन्त के साथ अमवसिद्धिक जीवो (जघन्य युक्तानन्त) को परस्पर 'अभ्यास' रूप से गुणित करने पर प्राप्त पूर्ण संख्या जघन्य अनन्त-अनन्त का परिमाण है अथवा उत्कृष्ट युक्तानन्त में एक प्रक्षेप करने से जघन्य अनन्त-अनन्त होता है। (२) तत्पश्चात् (जघन्य अनन्त-अनन्त के बाद) सभी स्थान मध्यम अनन्त-अनन्त होते हैं। क्योंकि उत्कृष्ट अनन्त-अनन्त राशि में कोई परिमाण सम्भव नहीं हैं। ___ यह कथन सैद्धान्तिक आचार्यों का हैं। किन्तु कुछ आचायों ने उत्कृष्ट अनन्त-अनन्त राशि का भी निरूपण किया हैं। उनका मत है कि जघन्य अनन्त-अनन्त का तीन बार वर्ग करके फिर उसमें निम्नलिखिल छह अनन्तों का प्रक्षेपण करना चाहिये- १. सिद्धजीवों की राशि, २. निगोद के जीवों की राशि, ३. वनस्पति कायिक जीवो की राशि, ४. तीनों कालों के समयों की राशि, ५. सर्वपुद्गल द्रव्यों की राशि, तथा ६. लोकाकाश तथा अलोकाकाश के प्रदेशों की राशि। (६ क्षेपक टीका तथा त्रिलोकसार की गाथा ४९ में वर्णित)।
SR No.090232
Book TitleJivsamas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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