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________________ सत्पदप्ररूपणाद्वार ६९ में से उगल पाय कशा को कष्टों का दुखों को सहता हुआ जीव रमावर्त में पहुँच जाता है। इस समय उसके अध्यवसाय शुद्ध हो जाते हैं। इन शुद्धवसायों ग्रन्थि स्थान तक पहुँचाने वाले अध्यवसाय को यथाप्रवृत्तिकरण कहते हैं। जीव के विशेष पुरुषार्थ के बिना ही अपने आप प्रवर्तमान होने वाला यह यथाप्रवृत्तिकरण जीव को अनन्त बार हो सकता है। परन्तु जो जीव ग्रन्थिभेद करने वाला होता है, उसके अध्यवसाय अपूर्व होते हैं। इस अपूर्व अध्यवसाय के कारण ही इस करण को अपूर्वकरण कहा जाता है। अपूर्वकरण की कालावधि केवल अन्तर्मुहूर्त होती है। ग्रन्थिभेद के पश्चात् जीव को अनिवृत्तिकरण नामक अध्यवसाय होता है। यह सभी ग्रन्थिभेद करने वालों को समान होता है। ग्रन्थिभेद के पश्चात् अन्तर्मुहूर्त में ही जीव को सम्यग्दर्शन की उपलब्धि होती है किन्तु उसकी प्राप्ति हेतु अनिवृत्तिकरण की अवस्था में जीव को अन्तरकरण की विशिष्ट प्रक्रियाएँ करनी पड़ती हैं। ग्रन्थिभेद करने के उपरान्त मिध्यात्व मोहनीय कर्म की जो स्थिति होती हैं उसमें प्रथम अन्तर्मुहूर्त को छोड़कर द्वितीय अन्तर्मुहूर्त में शेष रहे हुए मिथ्यात्व मोहनीय कर्म के पुद्गलों को अनिवृत्तिकरण अध्यवसाय द्वारा ऊपर-नीचे खिसकाकर मध्य में अन्तर्मुहूर्त जितना स्थान मिथ्यात्व के दलिकों से विहीन (शून्य स्थान या पोलाई) बनाते हैं। इस दलिकविहीन शून्य स्थान बनाने को अन्तरकरण कहा जाता है। उक्त अन्तरकरण के प्रयत्न से मिध्यात्व मोहनीय कर्म-स्थिति दो भागों में विभाजित हो जाती है। अन्तरकरण के प्रारम्भ समय से नीचे की स्थिति तथा अन्तिम समय की ऊपर की स्थिति । उपशम सम्यक्त्व के अनुभव द्वारा जब अन्तरकरण की अवधि पूर्ण होने लगती है तब कम से कम एक तथा अधिक से अधिक छः आवलिका जितना समय शेष रहने पर किसी संयोगवश अनन्तानुबन्धी का उदय हो जाता हैं। तब वह अधिकाधिक छः आवलिका तक सासादन गुणस्थान का अनुभव, स्पर्श करता हैं। सौभाग्यवश जिन्हें अनन्तानुबन्धी कषाय का उदय नहीं होता वे उपशम सम्यक्त्व के अनुभवकाल में मिध्यात्व की स्थिति में रहे कर्मदलिकों में से कितने ही दलिकों को शुद्ध अध्यवसाय द्वारा धोकर स्वच्छ बना लेते हैं तथा कितने ही को अर्थ स्वच्छ। फिर भी कितने ही दलिक पूर्ववत् मलिन बने रहते हैं। इस तरह मिथ्यात्व पुद्गलों के तीन भाग में विभाजित करने की प्रक्रिया को त्रिपुंजीकरण कहते हैं। यह इस प्रकार है १. अति स्वच्छ पुद्गलों को सम्यक्त्व मोहनीय, २. अर्ध स्वच्छ पुद्गलों को मिश्र मोहनीय, ३. अशुद्ध, अस्वच्छ पुद्गलों को मिथ्यात्व मोहनीय कहा जाता है।
SR No.090232
Book TitleJivsamas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1998
Total Pages285
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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