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________________ धीरे-धीरे इसे उस कीड़ा से प्रेम हो गया । यह देखकर धन लम्पटी जुआरियों ने अपने बाक जाल में फंसा लिया और प्रेम से उसे जुमा खेलने को तैयार कर लिया ।। ३६ ।। अत्यासक्तया समारब्ध मधिक सन्ततं ततः । हारिताश्व प्रगल्भेन द्रव्येकाचा कोटयः ।। ३७ ॥ वह कुमार भी कोड़ासक्त हो गया और दाव पर दाव लगाने लगा। इसे द्यूत अभ्यास तो था ही नहीं, मायाचार से भी दूर था अत: ११ करोड़ दीनार चूत में हार गया ।। ३७ ।। कोषाध्यक्षेन तातस्य वारिता पन याचिकाः । सात कोटयः समाकृष्टा वल्लभा कोगतस्ततः ।। ३ ।। जिनदत्त ने दीनार लाने के लिए कोषाध्यक्ष के पास उन्हें भेज दिया । किन्तु पिता के कोष रक्षक ने उन्हें प्रताड़ित किया एवं धन देने से इन्कार कर दिया । धन याचक खाली हाथ लौट आये । यह देखकर उसने अपनी प्रियतमा के कोष-खजाने से सात कोटि दीनारें मंगाई ॥३८॥ हारितास्तु निषिध्यास्ते याचकाः कोश पालिना। गत्वा तैः कथितं तस्य यथा स्वं न हि लभ्यते ।। ३६ ।। उनको भी हार गया । कोष पालक द्वारा रोके गये एवं प्रताड़ित याचकों ने जाकर जिनदत्त को सर्व वृत्तान्त सुनाया कि हमें धन प्राप्त नहीं हुया । कोषाध्यक्ष ने धन देने को मना कर दिया ।। ३६ ।। वचनेन ततस्तेषां तुहिनेनेव पङ्कजम् । मम्लो वदन मेतस्य संहृतं धूत कर्म च ॥ ४०॥ उनके वचनों को सुनते ही कुमार पर तुषारापात हो गया जिस प्रकार तुषार पात से कमल-सरोज म्लान हो जाते हैं उसी प्रकार इस अपमान से कुमार का मुख पङ्कज भी म्लान हो गया। उसने द्यूत कोड़ा बन्द कर दी और इस प्रकार विचारने लगा ॥ ४० ॥ वामशेष संसार सोल्य सम्पत्ति सालिनी। स्थमनोपाजिता लक्ष्मी न्यास्ते मानशालिनः॥४१॥ ५८ ]
SR No.090230
Book TitleJindutta Charit
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorTonkwala, Mahendrakumar Shastri
PublisherDigambar Jain Vijaya Granth Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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