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________________ कन्या कामदेव को लता समान है इसे इस कुमार को ही देना चाहिए। भला इससे बढ़कर इस पुत्री की शोभा बढाने वाला और कौन गुणों का भण्डार नर रत्न होगा" ? ।। ७१ ।। कुमारस्य मुखे न्यस्थ संहृता तरला स्थिरा । झलक प्रसरा दृष्टि यथास्याश्च विकासिनी ॥ ७२ ॥ यह सोचकर उसने कुमार को अपलक दृष्टि से देखा, अहो कितनी सुन्दर तरल इसकी दृष्टि है, स्थिर चित्त है, मुखकमल विकासिनी है, लक्ष प्रसारिखी है, सरल है ।। ७२ ।। यथा गण्डस्थलोस्ता मन्वाः स्वेदोद विन्दवः । स्लाम रागाः समुच्छ्वासौ यथा बाधर पल्लवः ।। ७३ ।। गंडस्थल पर श्रदूत स्वेद विन्दु कितने प्रिय हैं, उच्छवासो से मानों कोमल अधर पल्लब इसके म्लान हो गये हैं। लाली फीकी सी हो गई है ।। ७३ ।। वान्वृति: स्ललिताकम्प रोमाञ्चो सावधानता । सखीस्यास्तथा व्यक्त कुमारे अनि मानसम् ।। ७४ ।। वचन प्रणाली स्खलित सी है। शरीर पर रोम राजि-रोमाञ्चित तनुरूह मानों इसकी सावधानता के प्रतीक हैं । यह कन्या इसके मानस में सखिवत् प्रीति प्राप्त करेगी ॥ ७४ ॥ यथा चिन्तित मेवेदं संपन मम साम्प्रतम् । समाकृष्टोऽथवा पुण्येरथम स्याः समागतः ।। ७५ ।। मैं जो चाहता था प्राज वही इस समय मेरे सामने उपस्थित है । अथवा इस पुत्री के पुण्य से प्राकर्षित हुम्रा यह स्वयं श्रा उपस्थित हुआ है ।। ७५ ।। तथा प्रत्युप कारोयमेसे नास्य भविष्यति । कन्या रत्न मियं चैतत् सम्बन्धेनंय बम्धुरम् ॥ ७६ ॥ मैं समझता हूं इसके उपकार का प्रत्युपकार अन्य किसी प्रकार नहीं हो सकता, कन्या रत्न समर्पण करने से ही हो सकता है । फिर यह युग्म सुन्दर भी है ।। ७६ ।। ६० ]
SR No.090230
Book TitleJindutta Charit
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorTonkwala, Mahendrakumar Shastri
PublisherDigambar Jain Vijaya Granth Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size4 MB
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