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________________ गा० २२१ ] कदरेण पयारेण किट्टीणमुदीरणा पयहृदि, किं सरिसभावेण आहो विसरिसभावेणेति आसंकाए उत्तरमाह - ६७ * एदीए सण्णाए से काले जे पवेसेदि ते असरिसे पवेसेदि । $ १६२ एदीए अणंतरपरूविदाए सण्णाए पयदत्थणिण्णये कीरमाणे से काले जे अणुभागे पवेसेदि, ते णियमा असरिसे चेव पवेसेदि त्ति घेत्तव्वं । उदयम्मि संछुद्धात कट्टणमणुभागो एगअंतर किड्डीसरूवो ण होदि, किंतु अणंतकिट्टी सरूवो हो अच्छदित्ति भणिदं होदि । एत्थ से काले त्ति भणिदे ओकड्डिदाणंतरविदियसमये चेवेत्ति भणिदं होदि । दोनों विकल्पों में किस प्रकारसे कृष्टियोंकी उदीरणा प्रवृत्त होती है, क्या सदृशरूपसे या विसदृशरूपसे ऐसी आशंका होनेपर उत्तर कहते हैं - * इस संज्ञाके अनुसार अनन्तर समय में जिन कृष्टियोंको उदयमें प्रविष्ट करता है उन्हें असदृशी प्रविष्ट करता है । $ १६२ इस अनन्तर कही गई संज्ञाके अनुसार प्रकृत अर्थका निर्णय करने पर तदनन्तर समय में जिन अनुभागोंको प्रविष्ट करता है उनको नियमसे असदृशहो प्रविष्ट करता है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिये । उदयको प्राप्त अनन्त कृष्टियोंका अनुभाग एक अन्तरकृष्टिस्वरूप नहीं होता, किन्तु अनन्त कृष्टिस्वरूप होकर रहता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । प्रकृत में 'से काले' ऐसा कहने पर ' अपकर्षित करनेके अनन्तर दूसरे समय में ही' यह कहा गया है । विशेषार्थ- इस भाष्यगाथा में बतलाया गया है कि जिन कृष्टियोंका अपकर्षण होता है उनका अनन्तर समयमें क्या उदय - उदीरणारूपसे परिणमन होता है या नहीं होता है । यदि उस रूप परिणमन होता है तो वह सदृशरूपसे परिणमन होकर उदय उदीरणा होती है या विसदृशरूपसे परिणमनकर उदय-उदीरणा होती है । उत्कर्षण के लिये तो यह नियम है कि जिन कर्म परमाणुओं का स्थिति और अनुभागरूपसे उत्कर्षण होता है वे एक आवलि कालतक तदवस्थ रहते हैं किन्तु जिनका अपकर्षण होता है उनका दूसरे समय में हो अन्यरूप होना सम्भव है । इस नियम के अनुसार यहाँ यह प्रश्न है कि जिन अनन्त अवान्तर कृष्टियोंका अपकर्षण होता है वे क्या अनन्तर समय में एक कृष्टिरूपसे परिणमकर अवस्थित रहते हैं या क्या अनन्तर कृष्टिरूपसे परिणमकर वे अवस्थित रहते हैं । यह एक प्रश्न है । इसका समाधान करते हुए चूर्णिसूत्र में बतलाया है कि जिन अनन्त अवान्तर कृष्टियोंका यह जीव अपकर्षण करता है वे अगले समय में अनन्त कृष्टिरूपसे ही अवस्थित रहती हैं । १. पवेसे आ० ।
SR No.090228
Book TitleKasaypahudam Part 16
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages282
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size25 MB
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