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________________ खवगसेढीए पढमसमए अस्सकण्णकरणकारगपरूवणा ३२५ पमाणावहारणटुं सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * अणुभागसंतकम्मं सह आगाइदेण माणे थोवं, कोहे विसेसाहियं, मायाए विसेसाहियं, लोभे विसेसाहियं । ४४१ एत्थ सह आगाइदेणेत्ति वुत्ते अस्सकण्णकरणमाढतेण जमणुभागखंडयमागाइदं तेण सह तक्कालभावियस्स अणुभागसंतकम्मस्स एदमप्पाबहुअं कीरदि त्ति भणिदं होदि । एत्थ विसेसाहियपमाणमणंताणि फद्दयाणि । एदं च अप्पाबहुअमंतदीवयभावेण परूविदं । एत्तो हेट्ठा सव्वत्थेव संजलणागमणुभागसंतकम्मस्स एदेणेवप्पाबहुअविहिणा पवुत्तिदंसणादो। एवमागाइदेण सह पढमसमयअस्सकण्णकरणकारयस्स अणुमागसंतकम्मविसयमप्पाबहुअं परूविय संपहि अणभागबंधो वि तक्कालभाविओ संजलणाणमेदेणेव थोवबहुत्तविहाणेण पयदि त्ति जाणावणद्वमुवरिमं सुत्तमाह 8 बंधो वि एवमेव । $ ४४२. अणुभागबंधो वि एदेणेव अप्पाबहुअविहिणा पयदि त्ति भणिदं होइ । संपहि तत्थेव अस्सकपणकरणकारगस्स पढमसमए खंडयसरूवेणागाइदो अणुभागो कोहादिसंजलणेसु कधं पयदि त्ति एदस्स णिण्णयविहाणट्ठमुवरिममप्पाबहुअपयारमाह * अणुभागखंडयं पुण जमागाइदं तस्स अणुभागखंडयस्स फद अब वहींपर उनके अनुभाग सत्कर्मके अवधारण करनेके लिये आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * उक्त जीवने जो अनुभागसत्कर्म आरम्भ किया वह मानमें सबसे थोड़ा होता है, क्रोधमें उससे विशेष अधिक होता है, माया उससे विशेष अधिक होता है और लोभमें उससे विशेष अधिक होता है। ४४१. यहाँपर 'सह आगाइदेण' ऐसा कहनेपर अश्वकर्णकरणको आरम्भ करनेवाले जीवने जिस अनुभागकाण्डकको आरम्भ किया वह उसके साथ तत्काल होनेवाले अनुभागसत्कर्मके इस अल्पबहुत्वको करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। यहाँपर विशेषाधिकका प्रमाण अनन्तस्पर्धक होता है, और यह अल्पबहुत्व अन्तदीपकभावसे कहा गया है, क्योंकि इससे पूर्व सर्वत्र संज्वलनोंके अनुभागसत्कर्मकी इसी अल्पबहत्वविधिसे प्रवृत्ति देखी जाती है। इस प्रकार आरम्भ करनेके साथ अश्वकर्णकरणकारकके प्रथम समयमें अनुभागसत्कर्मविषयक अल्पबहुत्वका कथन करके अब संज्वलनोंका तत्काल होनेवाला अनुभागबन्ध भी इसी अल्पबहुत्वविधिसे प्रवृत्त होता है इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेके सूत्रको कहते हैं * बन्ध भी इसी विधिसे प्रवृत्त होता है। ६४४२. संज्वलनोंका अनुभागबन्ध भी इसी अल्पबहुत्वविधिसे प्रवृत्त होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अब वहीं अश्वकर्णकरणकारकके प्रथम समयमें काण्डकरूपसे आरम्भ होनेवाला अणुभाग क्रोधादि संज्वलनोंमें किस रूपसे प्रवृत्त होता है इस प्रकार इस बातका निर्णय करनेके लिये आगेके अल्पबहुत्वके प्रकारको कहते हैं * परन्तु जो अनुभागकाण्डक आरम्भ किया जाता है उस अनुभागकाण्डकके
SR No.090226
Book TitleKasaypahudam Part 14
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages442
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size40 MB
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