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________________ २४० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे * तं जहा । $ २१०. सुगमं । * जेसिं कम्माणं देसघादिफद्दयाणि अत्थि ताणि कम्माणि सव्व घादीणिण बंधदि, देसघादीणि बंधदि । $ २११. कुदो ९ पुव्वमेव तेसिं देसघादिबंधस्स पारद्वत्तादो । * त जहा । तं $ २१२. काणि ताणि कम्माणि जेसिमोवट्टणासंभवे देमघादिबंधणियमोत्त पुच्छिदं होइ । संपहि एवं पुच्छाविसईकयाणं तेसिं कम्माणं णामणिद्देसं कादूण तत्थ देसघादिबंधावहारणडुमिदमाह - * णाणावरणं चव्विहं दंसणावरणं तिविहं अंतराइयं पंचविहं एदाणि कम्माणि देसघादीणि बंधदि । २१३. दाणि कम्माणि पुव्वमेव अंतोमुहुत्तादो आढत्ता देसघादीणि चेव बंधदि । णो सव्वधादीणित्ति सुत्तत्थसमुच्चओ । एवं गाहापुव्वद्धविहासणं काढूण गाहाच्छद्धविहासा पयडिबंधविसेसपडिबद्धा सुगमा त्ति तमपरूविय पयदत्थमुवसंहरेमाणो सुत्तमुत्तरं भणइ - * वह जैसे । ६२१०. यह सूत्र सुगम है । * जिन कर्मोंके देशघातिस्पर्धक होते हैं, उन कर्मोंके सर्वघातिस्पर्धक नहीं बांधता है, देशघातिस्पर्धक बांधता है । $ २११. क्योंकि पहले ही उनका देशघातिरूप बन्ध प्रारम्भ हो गया है । वह जैसे । $ २१२. वे कर्म कौन हैं जिनकी अपवर्तना सम्भव होनेपर देशघातिरूप बन्धका नियम जाता है यह पृच्छा की गई है । अव इस प्रकारकी पृच्छाके विषय किये गये उन कर्मोंका नामनिर्देश करके उनके देशघातिरूप बन्धका अवधारण करनेके लिये इस सूत्र को कहते हैं - * चार ज्ञानावरण, तीन दर्शनावरण और पांच अन्तराय इन कर्मोंको देशधाति - रूप बांधता है । $ २१३. इन कर्मोंको अन्तर्मुहूर्त पहलेसे ही ग्रहण करके देशघातिरूप ही बाँधता है, सर्वघातिरूप नहीं बाँधता यह इस सूत्र का समुच्चयरूप अर्थ है । इस प्रकार गाथाके पूर्वार्धकी विभाषा करके गाथाके उत्तरार्धकी विभाषा प्रकृतिबन्धविशेषसे सम्बन्ध रखती है और सुगम है इसलिये उसकी प्ररूपणा न करके प्रकृत अर्थका उपसंहार करते हुए आगे सूत्रको कहते हैं
SR No.090226
Book TitleKasaypahudam Part 14
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages442
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size40 MB
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