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________________ जयधवला (३) जो प्रकृतियाँ उस समय बन्धको प्राप्त हो रही हैं उनकी आबाधाको उल्लंघनकर बन्ध स्थिति प्रथम निषेक से लेकर जो कि द्वितीय स्थितिमें स्थित है, उनकी बन्धको प्राप्त होनेवाली स्थितियों में अन्तर स्थितियोंके उत्कीरित किये जानेवाले प्रदेशपुंजको उत्कर्षण करके संक्रान्त करता है । यहाँ इतना विशेष जानना चाहिये कि अन्तरस्थितिके आयामकी अपेक्षा उस समय बन्धको प्राप्त होनेवाली प्रकृतियोंकी आबाधा संख्यातगुणी आयामसे युक्त होती है । २० यहाँ जिस समय अन्तरकी अन्तिम फालिका पतन होता है उस समय अन्तर प्रथम समयकृत कहलाता है और तदनन्तर समय में द्विसमयकृत कहलाता । आगे चूणिसूत्रों और उसकी जयधवला टीका में 'द्विसमयकृत' पद आया है उसका सर्वत्र यह अर्थ समझ लेना चाहिये । अनुवाद लिखते समय उपयोगकी अस्थिरता वश हमसे इस पदके एक ही अर्थ करनेमें सावधानी नहीं वरती गई है सो पाठक इसे ध्यान में रखकर उसको समझ करके ही स्वाध्याय करें। क्योंकि 'अन्तर द्विकृत' पदका अर्थ अन्तर द्विसमयकृतरूप करना भी असंगत नहीं है । इस प्रकार अन्तरकरण क्रियाके सम्पन्न होनेके अनन्तर समयमें यह जीव नपुंसक वेदका आयुक्तकरण संक्रामक होता है अर्थात् यहाँसे यह जीव नपुंसकवेदकी क्षपणाके लिये उद्यत होकर प्रवृत्त हो जाता है । तदनन्तर संख्यात हजार स्थितिकाण्डकोंके जानेपर नपुंसक वेदके अन्तिम स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिका पुरुषवेदमें संक्रम हो जाता है । तदनन्तर स्त्रीवेदकी क्षपणाका प्रारम्भ करते ही अन्य स्थितिकाण्डक, अन्य अनुभागकाण्डक और अन्य स्थितिबन्ध प्रारम्भ हो जाता है । विधि वही है जो नपुंसक वेदको अपेक्षा कह आये हैं । तदनन्तर सात नोकषायों का संक्रामक होता है । अन्तरकरण क्रियाके सम्पन्न होनेके अनन्तर समयसे ही आनुपूर्वी संक्रम प्रारम्भ हो जाता है, उक्त नियमके अनुसार छह नोकषायोंका तो क्रोधसंज्वलनमें संक्रम होता ही है । पुरुषवेदका भी शेष मान संज्वलन आदि कषायों को छोड़कर क्रोधसंज्वलन में हो संक्रम होता है । आगे भी इसी प्रकार संक्रमकी आनुपूर्वी जान लेनी चाहिये । मात्र लोभ संज्वलनका अन्य किसी प्रकृतिमें संक्रम न होकर उसका स्वमुखसे ही क्षय होता है। तदनन्तर जब पुरुषवेदकी प्रथम स्थितिमें दो आवलिप्रमाण काल शेष रह जाता है तब आगाल और प्रत्यागालकी व्युच्छित्ति हो जाती है तथा वहाँसे लेकर प्रथम स्थितिमेंसे ही उदीरणा होने लगती है । प्रथम स्थितिमें स्थित प्रदेशपुंजको उत्कर्षण द्वारा द्वितीय स्थितिमें निक्षिप्त करना इसका नाम आगाल है । तथा द्वितीय स्थितिमें स्थित प्रदेशपुंजका अपकर्षण करके प्रथम स्थितिमें निक्षिप्त करना इसका नाम प्रत्यागाल है । इन प्रकृतियोंकी प्रथम स्थिति में जब एक समय अधिक एक आवलि काल शेष रहता है तब इनकी जघन्य स्थिति उदीरणा होती है । उसके बाद जब यह जीव अन्तिम समयवर्ती सवेदी होता है तभी छह नोकषायोंके अन्तिम काण्डककी अन्तिम फालि सर्व संक्रम द्वारा क्रोधसंज्वलनमें संक्रान्त हो जाती है । किन्तु उस समय पुरुषवेदका एक समय कम दो आवलिप्रमाण नवक समयप्रबद्ध द्वितीय स्थितिमें शेष रहता है और उसयस्थिति भी शेष रहती है। यहाँ जो यह नवकप्रबन्ध शेष रहा है उसका अंगले समयसे उतने ही काल द्वारा क्रोधसंज्वलन में संक्रम होकर क्षपणा होती है ऐसा यहाँ समझना चाहिये । आगे अपगतवेदी होनेके बाद क्रोधसंज्वलनकी क्षपणाका प्रारम्भ करता हुआ यह जीव अश्वकर्णकरण नामक करणविशेषको प्रारम्भ करता है । फिर भी इसे स्थगित कर सबसे पहले प्रकृतमें पठित गाथा सूत्रोंकी मीमांसा करते हैं ।
SR No.090226
Book TitleKasaypahudam Part 14
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages442
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size40 MB
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