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________________ गाथा ११४ ] अट्टिकरणे कज्जविसेस परूवणा * तदो ट्ठिदिखंडए णिट्ठायमाणे णिट्ठिदे मिच्छत्तस्स जहण्णओ ट्ठिदिसंकमो, उक्कस्सओ पदेससंकमो । ताघे सम्मामिच्छुत्तस्स उक्कस्सगं पदेससंतकम्मं । ५१ $ ६९. तम्हि मिच्छत्तस्स चरिमट्ठिदिखंडए कमेण णिट्टविजमाणे णिट्टिदे तक्काले चैव मिच्छत्तस्स जहण्णगो ट्ठिदिसंकमो होइ । एत्तो अण्णस्स मिच्छत्तट्ठिदिसंकमस्स जहण्णस्साणुवलंभादो । ताघे चैव मिच्छत्तस्स उक्कस्सगो पदेससंकमो, मिच्छत्तदव्वस्स सव्वस्सेव सव्वसंकमेण संकममाणस्स तहाभावोववत्तदो । वरि जह एसो गुणिदकम्मंसियणेरइयपच्छायदो समयाविरोहेण सव्वलहुमागंतूण दंसणमोहक्खवणाए अब्भुट्टिदो तो उकस्सओ मिच्छत्तस्स पदेससंकमो होइ । अण्णा वुण अजहण्णाणुकस्सओ पदेससंकमो त्ति वत्तव्वं । सुत्ते पुण गुणिदकम्मंसियविवखाए उकस्सओ पदेससंकमो णिद्दिट्ठो त्तिण किं चि विरुद्धं । ताघे चैव सम्मामिच्छत्तस्स उक्कस्सयं पदेससंतकम्ममुवजायदे, मिच्छत्तदव्वस्स सव्वस्सेव किंचूणदिवडगुणहाणिमेत्तसमयपबद्धपमाणस्स तस्सरूवेण परिणदत्तादो । तदो मिच्छत्तजइण्णट्ठिदिसं कम सहगदुक्कस्सपदेससंकम पडिग्गहवसेण सम्मामिच्छत्तस्सुक्कस्सपदेस संतकम्मं तक्काल पडिबद्धमुपज्जदिति सिद्धं । * इस प्रकार मिथ्यात्वके समाप्त होनेवाले अन्तिम स्थितिकाण्डकके समाप्त होनेपर मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसंक्रम और उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है तथा उसी समय सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म होता है । $ ६९. वहाँपर मिथ्यात्व के क्रमसे समाप्त होने योग्य अन्तिम स्थितिकाण्डकके समाप्त होनेपर उसी समय मिध्यात्वका जघन्य स्थितिसंक्रम होता है, क्योंकि मिध्यात्वका इससे जघन्य अन्य स्थितिसंक्रम नहीं पाया जाता । तथा उसी समय मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है, क्योंकि मिथ्यात्व के समस्त द्रव्यका सर्वसंक्रमसे संक्रम करनेवाले जीवके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमकी व्यवस्था वन जाती है । इतनी विशेषता है कि गुणितकर्माशिक नारक भवसे पीछे आकर मनुष्य पर्यायको ग्रहण करनेवाला यह जीव आगममें बतलाई हुई विधिके अनुसार अति शीघ्र आकर दर्शनमोहनीयकी क्षपण के लिये उद्यत हुआ, तब उसके मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है । अन्यथा अजघन्य - अनुत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है ऐसा कहना चाहिए । यद्यपि सूत्र में गुणितकर्माशिककी विवक्षासे उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमका निर्देश किया है तो भी कुछ विरुद्ध नहीं है । तथा उसी समय सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म उत्पन्न होता है, क्योंकि मिध्यात्वका कुछ कम डेढ़ गुणहानिगुणित समयप्रबद्धप्रमाण समस्त द्रव्य उस रूपसे परिणम जाता है । इसलिए मिथ्यात्व के जघन्य स्थितिसंक्रमके साथ प्राप्त हुए उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमके प्रतिग्रहवश उसी कालसे सम्बन्ध रखनेवाला सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म होता है यह सिद्ध हुआ ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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