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________________ गाथा ११४ ] अपुवकरणे कज्जविसेसपरूवणा खंडयसहस्साविणाभावीसु गदेसु तदो अपुव्वकरणद्धाचरिमसमयमेसो पावदि त्ति पदुप्पायणट्टमुत्तरसुत्तावयारो * एदेण कमेण हिदिखंडयसहस्सेहिं बहुएहिं गदेहिं अपुव्वकरणद्धाए चरिमसमयं पत्तो। ५१. गयत्थमेदं सुत्तं । * तत्थ अणुभागखंडयउक्कीरणकालो द्विदिखंडयउक्कीरणकालो हिदिबंधकालो च समगं समत्तो। $ ५२. गयत्थमेदं पि सुत्तं । ६५३. एवमपुवकरणे द्विदिखंडयादिपरूवणं समाणिय संपहि तत्थेव द्विदिअविनाभावी है ऐसे हजारों स्थितिकाण्डकोंके व्यतीत होनेपर तदनन्तर अपूर्वकरणकालके अन्तिम समयको यह जीव प्राप्त करता है इस बातके कथनके लिये आगेके सूत्रका अवतार है * इस क्रमसे अनेक हजारों स्थितिकाण्डकोंके व्यतीत होनेपर अपूर्वकरणके कालके अन्तिम समयको प्राप्त होता है । $ ५१. यह सूत्र गतार्थ है। * वहाँ अनुभागकाण्डकका उत्कीरणकाल, स्थितिकाण्डकका उत्कीरण काल और स्थितिबन्धकाल एक साथ समाप्त होते हैं । $ ५२. यह सूत्र भी गतार्थ है। विशेषार्थ—यहाँ उक्त सब कथनका तात्पर्य यह है कि अपूर्वकरणके प्रथम स्थितिकाण्डकका जितना आयाम है, उससे दूसरेका विशेषहीन है, दूसरेसे तीसरेका विशेषहीन है । यह क्रम अपूर्वकरणके अन्तिम स्थितिकाण्डकके प्राप्त होने तक जानना चाहिए । किन्तु इसप्रकार प्रथम स्थितिकाण्डकके आयामकी अपेक्षा आगेके स्थितिकाण्डकोंके आयामको देखा जाय तो अपूर्वकरणके कालके भीतर ही मध्यके स्थितिकाण्डकका आयाम प्रथम स्थितिकाण्डकके आयामसे संख्यातगुणा हीन हो जाता है और इसप्रकार अपूर्द कर गाके समस्त कालके भीतर संख्यात स्थितिकाण्डक गुणहानियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यह लो एक विशेषता हुई । दूसरी विशेषता यह है कि यहाँ सर्वत्र प्रत्येक स्थितिकाण्डकका काल और स्थितिबन्धका काल समान होता है। इसका तात्पर्य यह है कि अपूर्वकरणमें जितने स्थितिकाण्डकघात होते हैं, उतने ही स्थितिबन्धापसरण भी होते हैं, क्योंकि दोनोंका काल समान है। तीसरी विशेषता यह है कि एक-एक स्थितिकाण्डकघातके कालमें हजारों अनुभागकाण्डकघात होते हैं। चौथो विशेषता यह है कि अपूर्वकरणके कालके समाप्त होनेके साथ वहाँ प्राप्त अनुभाग काण्डक उत्कीरणकाल, स्थितिकाण्डक उत्कीरणकाल और स्थितिबन्धकाल ये तीनों एक साथ समाप्त होते हैं। $ ५३. इसप्रकार अपूर्वकरणमें स्थितिकाण्डक आदिकी प्ररूपणा समाप्त करके अत्र
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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