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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [दसणमोहक्खवणा ४५. एवमपुव्वकरणपढमसमए समगमाढत्ताणं ट्ठिदि-अणुभागखंडय-तबंधोसरणाणं गुणसेढिणिक्खेवस्स च विदियादिसमएसु कथं पवुत्ती, किमण्णारिसी आहो तारिसी चेवे त्ति एदस्स णिण्णयविहाणट्ठमुत्तरसुत्तारंभो __* विदिसमए तं चेव हिदिखंडेयं, तं चेव अणुभागखंडयं, सो चेव हिदिबंधो, गुणसेढी अण्णा । ४६. विदियसमए ताव द्विदि-अणुभागखंडय-द्विदिबंधोसरणेसु णत्थि णाणत्तं, पढमसमयमाढत्ताणं चेव तेसिमंतोमुहुत्तकालमवविदभावेण पत्तिदंसणादो । गुणसेढी पण अण्णारिसी होइ । किं कारणं ? पढमसमयोकड्डिददव्वादो असंखेज्जगुणं दव्वमोकड्डियण उदयावलियबाहिरे गलिदसेसायामेण तण्णिक्खेवं करेदि त्ति । तम्हा गुणसेढिणिक्खेवे चेव थोवयरो विसेसो। गुणितक्रमसे अन्य सजातीय प्रकृतियोंमें संक्रमित होना गुणसंक्रम कहलाता है। यहाँ मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दो प्रकृतियोंका गुणसंक्रम प्रारम्भ हो जाता है । इस प्रकार अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर ये चार कार्यविशेष प्रारम्भ हो जाते हैं ऐसा यहाँ समझना चाहिए। ४५. इस प्रकार अपूर्वकरणके प्रथम समयमें एक साथ आरम्भ किये गये स्थितिकाण्डक, अनुभागकाण्डक, स्थितिबन्धापसरण, अनुभागबन्धापसरण और गुणश्रेणिनिक्षेपकी द्वितीयादि समयोंमें किस प्रकार प्रवृत्ति होती है, क्या अन्य प्रकारकी होती है या उसी प्रकारकी होती है इस प्रकार इसके निर्णयका कथन करने के लिये आगेके सूत्रका आरम्भ है * दूसरे समयमें वही स्थितिकाण्डक है, वही अनुभागकाण्डक है, वही स्थितिबन्ध है, किन्तु गुणश्रेणि अन्य होती है । $ ४६. दूसरे समयमें भी स्थितिकाण्डक, अनुभागकाण्डक और स्थितिबन्धापसरणमें भेद नहीं है, क्योंकि प्रथम समयमें आरम्भ किये गये उन्हींकी अन्तर्मुहूर्त काल तक अवस्थित रूपसे प्रवृत्ति देखी जाती है। परन्तु गुणश्रेणि अन्य प्रकारकी होती है, क्योंकि प्रथम समयमें जितने द्रव्यका अपकर्षण हुआ है उससे असंख्यातगुणे द्रव्यका अपकर्षणकर उदयावलिके वाहर गलित शेष आयामरूपसे उसका निक्षेप करता है । इसलिए गुणश्रेणिनिक्षेपमें ही थोड़ी विशेषता है। विशेषार्थ—यह तो पहले ही बतला आये हैं कि गुणश्रेणि आयाम अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणके कालसे कुछ अधिक कालप्रमाण है। यतः यह गलितावशेष गुणश्रेणि है, अतः दूसरे समय उसके आयाममें एक समयकी कमी हो जाती है। इसी प्रकार आगे भी उसके आयाममें एक-एक समयकी कमी तब तक जानना चाहिए जब तक उसकी रचना होती रहती है। साथ ही प्रथम समयमें गुणश्रेणि आयाममें जितने द्रव्यका निक्षेप होता है उससे असंख्यातगुणे द्रव्यका निक्षेप उसमें दूसरे समयमें होता है । इसी प्रकार आगे भी प्रत्येक समयमें असंख्यातगुणे असंख्यातगुणे द्रव्यका निक्षेप गुणश्रेणि रचनाके अन्तिम समय तक जानना चाहिए। १. ता० प्रती ताव अणुभागखंड्य- इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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