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________________ गाथा ११४ ] सुत्तपरिहासा संजदासंजदो पमत्तापमत्ताणमण्णदरो संजदो वा सव्वविसुद्धेण परिणामेण दंसणमोहक्खवणाए पयदि त्ति घेत्तव्वं । तस्स तहा पयट्टमाणस्स तिण्डं कम्माणं मिच्छत्तसम्मत्त-सम्मामिच्छत्तसण्णिदाणं द्विदीओ अंतोकोडाकोडिमेत्ताओ बुद्धीए पुध पुध ओट्टिदव्याओ विरचेहव्याओ, अण्णहा' तन्विसयट्ठिदिखंडयघादादिपरूवणाए सुहावगमत्ताणुववत्तीदो। एवमेदेसि कम्माणं परिवाडीए द्विदीणं विण्णासं कादूण पुणो किं कायव्वमिच्चासंकाए इदमाह-- * अणुभागफहयाणि च ओट्टियव्वाणि । .5 १३. तेसिं चेव तिण्हं कम्माणमणुभागफद्दयाणि च जहण्णफद्दयप्पहुडि जाव उक्कस्सफद्दयं ति ताव हिदि पडि तिरिच्छेण विरचेयव्वाणि, तेसिं विरचणाए विणा तविसयकंडयघादादिपरूवणाए सिस्साणं सुहावबोहाणुववत्तीदो। एत्थ सेसकम्माणं पि णाणावरणादीणं द्विदीओ अणुभागफद्दयाणि च ओट्टेयव्वाणि तव्विसयखंडयघादजाणावणणिमित्तमिदि चे ? सच्चमेदं, तत्थ पडिसेहाभावादो। किंतु पहाणभावेणेदेसि तिण्हं कम्माणं विसेसघादपदुप्पायणटुं विसेसियूण परूवणा कदा, तम्हा तेसि पि हिदि-अणुभागा ओट्टिदव्वा । एवमेदं परूविय संपहि एत्थ तिण्हं करणाणं सरूवप्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतोंमेंसे अन्यतर संयत मनुष्य सर्व विशुद्ध परिणामके द्वारा दर्शनमोहकी क्षपणा करनेमें प्रवृत्त होता है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। उस प्रकारसे प्रवृत्त हुए उसके मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन तीन कर्मोंकी अन्तःकोड़ाकोड़ी प्रमाण स्थितियोंको बद्धिमें पृथक पृथक 'ओट्रिदवाओ' अर्थात रचित करनी चा अन्यथा तविषयक स्थितिकाण्डकघात आदिकी प्ररूपणाका सुखपूर्वक ज्ञान नहीं हो सकता। इस प्रकार इन कर्मोंकी स्थितियोंको परिपाटीसे रचनाकर पुनः क्या करना चाहिए ऐसी आशंका होनेपर इस सूत्रवचनको कहते हैं * तथा उन्हीं तीनों कर्मों के अनुभाग स्पर्धकोंकी भी पृथक-पृथक रचना करनी चाहिए। १३. उन्हीं तीनों कोंके जघन्य स्पर्धकसे लेकर उत्कृष्ट स्पर्धक तक अनुभागस्पधकोंकी भी प्रत्येक स्थितिके प्रति तिर्यकरूपसे रचना करनी चाहिए, क्योंकि उनकी रचना किये बिना तद्विषयक काण्डकघात आदि प्ररूपणाका शिष्योंको सुखपूर्वक ज्ञान नहीं हो सकता। शंका–यहाँ पर ज्ञानावरणादि शेष कर्मोंकी भी स्थितियों और अनुभागस्पर्धकोंके तद्विषयक काण्डकघातका ज्ञान करानेके लिए रचना करना चाहिए ? समाधान—यह कहना सत्य है, क्योंकि इस विषयमें प्रतिषेधका अभाव है। किन्तु प्रधानरूपसे इन तीन कर्मोंकी विशेष बातका कथन करनेके लिये विशेषरूपसे प्ररूपणा की है, इसलिए उन ज्ञानावरणादि कर्मोंकी भी स्थिति और अनुभागकी रचना करनी चाहिए । इस १. ता० प्रती ओट्रिदवाओ अण्णहा इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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