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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे दिसणमोहक्खवणा १०. का सुत्तविहासा णाम ? गाहासुत्ताणमुच्चारणं कादूण तेसिं पदच्छेदाहिमुहेण जा अत्थपरिक्खा सा सुत्तविहासा ति भण्णदे । सुनपरिहासा पुण गाहासुत्तणिबद्धमणिबद्धं च पयदोवजोगि जमत्थजादं तं सव्वं घेत्तूण वित्थरदो अत्थपरूवणा सा ताव पुव्वमेत्थाणुगंतव्वा । पच्छा सुत्तविहासा कायव्वा । किं कारणं ? सुत्तपरिभासमकादूण सुत्तविहासाए कीरमाणाए सुत्तत्थविसयणिच्छयाणुप्पत्तीदो। तदो सुत्तपरिभासमेव पुन्वं कुणमाणो तव्विसयं पुच्छावक्कमाह-- * तं जहा। ११. सुगमं । * तिण्हं कम्माणं हिदीओ ओहिदवाओ । 5 १२. एत्थ ताव जो वेदगसम्माइट्ठी दंसणमोहक्खवणं पट्टवेइ सो पुव्वं चेवाणंताणुबंधिचउक्क विसंजोएइ, अविसंजोइदाणताणुबंधिचउक्कस्स दंसणमोह खवणपट्ठवणाणुववत्तीदो । तदो अणंताणुबंधिविसंजोयणाए अधापवत्तादिकरणपडिबद्धाए पुव्वमेत्थाणुगमो कायव्वो। सो उण चरित्तमोहोवसामणाए सवित्थरं भणिस्समाणत्तादो णेह पवंचिज्जदे। तम्हा विसंजोइदाणताणुबंधिचउक्को वेदयसम्मादिट्ठी असंजदो 5. १०. शंका-सूत्रविभाषा किसे कहते है ? समाधान-गाथासूत्रोंका उच्चारणकर उनकी पदच्छेद आदिके द्वारा जो अर्थपरीक्षा की जाती है उसे विभाषा कहते हैं। परन्तु प्रकृतमें उपयोगी जो अर्थ समूह गाथासूत्रोंमें निबद्ध है या अनिबद्ध है उस सबको ग्रहण कर विस्तारसे अर्थकी प्ररूपणा करनेको सूत्र परिभाषा कहते हैं। उसे सर्वप्रथम यहाँ जानना चाहिए, उसके बाद सूत्रविभाषा करनी चाहिए, क्योंकि सूत्रोंकी परिभाषा न कर सूत्रोंकी विभाषा करने पर सूत्रोंका अर्थविषयक निश्चय नहीं बन सकता, इसलिए गाथासूत्रोंकी परिभाषाको ही सर्व प्रथम करते हुए तद्विषयक पृच्छावाक्यको कहते हैं * वह जैसे। ६११. यह सूत्र सुगम है। * तीनों कर्मोंकी स्थितियोंकी पृथक्-पृथक् रचना करनी चाहिए । ६ १२. प्रकृतमें जो वेदकसम्यग्दृष्टि जीव दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारभ करता है वह पहले ही अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना करता है, क्योंकि जिसने अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना नहीं की है वह दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ नहीं कर सकता। इसलिए अधःप्रवृत्त आदि करणोंसे सम्बन्ध रखनेवाली अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी विसंयोजनाका यहाँ सर्वप्रथम अनुगम करना चाहिए। परन्तु उसका चारित्रमोहकी उपशमनाका कथन करते समय विस्तारसे कथन करेंगे, इसलिए यहाँ उसका कथन नहीं करते हैं । इसलिये जिसने अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी विसंयोजना की है ऐसा वेदकसम्यग्दृष्टि असंयत, संयतासंयत तथा
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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