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________________ जयधवलास हिदे कसाय पाहुडे [ सणमोहवणा ५. संपहि तदवस्थाएं वट्टमाणस्स तस्स लेस्साभेदो को होदिति पुच्छिदे व्यावहारणमिदमुवइहूं— 'जहण्णगो तेउलेस्साए' चि । दंसणमोहक्खवणढाए अमंतरे सव्वत्येव वट्टमाणसुहतिलेस्साणमण्णदरलेस्सिओ चेव होइ, णाण्णलेस्सिओ, किन्ह- गील-काउलेस्साणं विसोहिविरुद्धसद्दावाणमच्चंताभावेण तत्थ पडिसिद्धत्तादो । तदो वि मंदपरिणामे वट्टमाणो दंसणमोहक्खवगो तेउलेस्सं पण बोलेदि त्ति एसो ree भावत्थो । ६ मिथ्यात्व प्रकृतिका सम्यक्त्व प्रकृतिमें पूरा संक्रमण हो लेता है तब जाकर यह जीव दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रस्थापक कहलाता है । इस पर दो शंकाऐं उत्पन्न होती हैं । प्रथम यह कि मिथ्यात्व के द्रव्यकी अन्तिम फालिका एकमात्र सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति में ही संक्रमण होता है। सम्यक्त्व प्रकृति में नहीं, ऐसी अवस्थामें उक्त गाथासूत्र में जो यह कहा है कि मिथ्यात्व वेदनीय द्रव्यको पूरा अपवर्तनकर सम्यक्त्व में प्रक्षिप्त करता है; वह कहना कैसे बन सकता है ? दूसरी यह कि जब कि यह जीव अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयसे ही दर्शन मोहनीय की क्षपणाका प्रस्थापक हो जाता है ऐसी अवस्था में मिथ्यात्व मोहनीयके समस्त द्रव्यका संक्रम होनेपर अनन्तर समय से लेकर गाथासूत्र में इसे दर्शनमोहनी की क्षपणाका अस्थापक क्यों कहा ? ये दो प्रश्न हैं। इनमें से प्रथम प्रश्नका समाधान करते हुए atre स्पष्टीकरण किया गया है कि मिध्यात्वके द्रव्यका पूरा संक्रम करनेके बाद सम्यगध्यात्व प्रकृतिकी मिथ्यात्व संज्ञा स्वीकार कर गाथासूत्र में उक्त प्रकार से विधान किया गया है । इस समाधानका आशय यह है कि मूलमें तो एक मिध्यात्व प्रकृतिका ही होता है और प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी प्राप्तिके पूर्वतक उसीकी सत्ता और उदय उदीरणा होती है । मिथ्यात्व के द्रव्यका तीन भागों में विभागीकरण तो प्रथमोपशम सम्यक्त्व प्राप्त होनेके प्रथम समय से ही सम्यग्दृष्टिके होता है । अतः विचार कर देखा जाय तो सम्यग्मिध्यात्वप्रकृतिको मिथ्यात्वप्रकृति कहना वन जाता है । दूसरे प्रश्नके समाधानका आशय यह है कि मिथ्यात्वका पूरा संक्रम जहाँ यह जीव सम्यग्मिथ्यात्व में करता है वहाँसे इसे दर्शनमोहनी की क्षपणका प्रस्थापक प्रयोजन विशेषसे कहा गया है वैसे यह जीव अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समय से ही दर्शनमोहनीयको क्षपणाका प्रस्थापक है ऐसा स्वीकार करना युक्तियुक्त ही है। 1 $ ५. अब उस अवस्थामें वर्तमान उसके कौनसा लेश्याभेद होता है ऐसी पृच्छा होनेपरश्याविशेषका अवधारण करनेके लिए यह वचन कहा है- 'जहण्णगो तेडलेस्साए ।' मोहक क्षपणा करते समय सर्वत्र ही वर्तमान शुभ तीन लेश्याओं में से अन्यतर लेश्यावाला ही होता है, अन्य लेश्यावाला नहीं होता, क्योंकि विशुद्धिके विरुद्ध स्वभाववाली कृष्ण, नील और कापोत लेश्याओंका वहाँ अत्यन्त अभाव होनेसे निषेध किया है । अतः विशुद्धिरूप परिणामोंमेंसे जघन्यरूप मन्द परिणामों में विद्यमान दर्शनमोहनीयका क्षपक जीव तेजोलेश्याका उल्लंघन नहीं करता यह उक्त गाथासूत्रशिका भावार्थ है । विशेषार्थ — जब यह जीव दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका प्रारम्भ करता है तबसे लेकर कृतकृत्यवेषक सम्यग्दृष्टि होने तक इस जीवके एक सात्र शुभ तीन लेश्याओं से कोई एक लेश्या ही पाई जाती है, क्योंकि अशुभ तीन लेश्याएँ विशुद्धिके विरुद्ध स्वभाववाली होने के कारण उक्त जीवके उनमें से एक भी लेश्या नहीं पाई जाती । एकमात्र इसी तथ्य को स्पष्ट
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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