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________________ सिरि- जइव सहाइरियविरइय-चुण्णिसुत्तसमणिदं सिरि-भगवंतगुणहर भडार प्रोवइट्ठ कसाय पाहुड तस्स सिरि- वीरसेाइरियविरइया टीका जयधवला तत्थ दंसणमोहक्खवणा णाम एगारसमो अत्थाहियारो 4:8:+ खविघणघाइकम्मं भवियजणाणंदकारिणं वीरं । मिथूण भणिस्सामो दंसणमोहस्स खवणविहिं ॥ १ ॥ * दंसणमोहक्खवणाए पुत्र्वं गमणिजाओ पंच सुत्तगाहाओ । $ १. दंसणमोहोवसामणापरूवणानंतरं जहावसरपत्ताए दंसणमोहक्खवणाए अत्थविहासा एहम हिकीरदि । तत्थ गुणहराइरिय मुहकमलविणिग्गयाओ अनंतस्थगब्भिणाओ पंच सुत्तगाहाओ पडिबद्धाओ । ताओ पुव्वमेत्थ' परूवेयव्वाओ, ताहि 1 जिन्होंने अत्यन्त सान्द्र घातिकमका नाश कर दिया है और जो भव्य जीवोंको आनन्द देनेवाले हैं ऐसे वीर जिनको नमस्कार कर आगे दर्शनमोह - क्षपणाविधिका कथन करेंगे ॥ १ ॥ * दर्शनमोहकी क्षपणाके विषयमें सर्व प्रथम इन पाँच सूत्र गाथाओंकी प्ररूपणा करनी चाहिए | $ १. दर्शनमोहकी उपशमनाके कथनके अनन्तर इस समय यथा अवसर प्राप्त दर्शनमोहकी क्षपणाके अर्थका विशेष व्याख्यान अधिकृत है । उसमें गुणधर आचार्य के मुखकमलसे निकली हुईं, जिनमें अनन्त अर्थ गर्भित हैं, ऐसी पाँच सूत्रगाथायें प्रतिबद्ध हैं उनका यहाँ पर १. ता० प्रतौ पुव्वमेव इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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