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________________ न ( ३९ ) पृ. सं. पृ. सं. प्रथम स्थितिको करते हुए उदय आदिमें जब तीन प्रकारको मायाका अन्तिम प्रदेशनिक्षेपके क्रमका निर्देश समयवर्ती उपशामक होता है इसका जब तीन प्रकारके मानका उपशामक निर्देश ३०३ ___ होता है इस बातका निर्देश २९७ जब मायासंज्वलनकी बन्ध और उदय उस समय स्थितिबन्धका विचार २९७ व्युच्छित्तिके कालका निर्देश ३०४ मानसंज्वलनकी प्रथम स्थितिमें तीन मायासंज्वलनको एक समय कम एक आवलि शेष रहने पर उसमें दोमान आवलिप्रमाण प्रथम स्थितिका संक्रमित नहीं होते इस बातका लोभसंज्वलनरूपसे उदयका निर्देश ३०४ निर्देश | तभी लोभसंज्वलनकी प्रथम स्थिति उसकी प्रत्थावलिके शेष रहने पर करनेका निर्देश ३०४ आगाल-प्रत्यागालकी व्युच्छित्ति हो लोभसंज्वलनकी प्रथम स्थितिके प्रमाणजाती है इस बातका निर्देश २९८ __ का निर्देश ३०४ प्रत्यावलिमें एक समय शेष रहने पर तभी सब कर्मोंके स्थितिबन्धके प्रमाणमानसंज्वलनके एक समय कम दो का निर्देश ३०५ आवलि बन्धको छोड़कर तीन लोभसंज्वलनको प्रथम स्थितिका अर्धप्रकारके मानका प्रदेशतत्कर्म पूरा भाग जब व्यतीत होता है उस कालका निर्देश ३०६ उपशान्त हो जाता है इसका निर्देश ६९९ उस समय सब कर्मोके स्थितिबन्धके उस समय सब कर्मोका स्थितिबन्ध प्रमाणका निर्देश ३०६ कितना होता है इस बातका निर्देश २९९ | इसी समय तक लोभसंज्वलनका अनुभाग मायासंज्वलनकी प्रथम स्थिति करनेका निर्देश स्पर्धकगत होता है इस बातका ३०० ३०७ उस समयसे तीन प्रकारको मायाका उपशामक होता है इसका निर्देश ३०० आगे जधन्य अनुभागके नीचे अनुभाग कृष्टियोंके करनेका निर्देश ३०७ तब स्थितिबन्धका विचार ३०० | प्रकृतमें बननेवाली कृष्टियोंके प्रमाणका मानसंज्वलनका एक समय कम उदयावलिप्रमाण शेष रहने पर उसका प्रथमादि समयोंसे द्वितीयादि समयोंमें मायाके उदयमें स्तिवुकसंक्रमका कितनी कृष्टियाँ बनती हैं इसका निर्देश ३०१ निर्देश ३०८ मानसंज्वलनके दो समय कम दो आवलि कृष्टियोंमें प्रथमादि समयोंमें किस क्रमसे प्रमाण समयप्रबद्धोंका उतने ही प्रदेश निक्षेप होता है इसका निर्देश समयमें उपशमित होनेका निर्देश ३०२ कृषियोंमें प्रदेशविषयक अल्पबहुत्का मायाके उपशमानेको प्रक्रियाका निर्देश ३०२ निर्देश ३१० जब दो प्रकारकी माया मायासंज्यलनमें तीव्र-मन्दताकी अपेक्षा कृष्टियोंके अल्पसंक्रमित नहीं होती इसका निर्देश ३०३ बहुत्वका निर्देश ३१४ मायासंज्वलनमें प्रत्यावलि शेष रहने पर कृष्टिकरण काल कितना होता है इस आगाल-प्रत्यागालकी व्युच्छित्ति हो बातका निर्देश ३१५ जाती है इसका निर्देश ३०३ | कृष्टिकरण कालका संख्यात बहुभाग जाने निर्देश निर्देश ३०८
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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