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________________ गाथा १२३ ] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए करणकज्जणिदेसो २९५ कोहसंजलणस्स पढमद्विदी उच्छिट्ठावलियमेत्ता सेसा ताधे कोहसंजलणस्स बंधोदया वोच्छिजंति त्ति जाणावणमुत्तरसुत्तमोइण्णं- .. ___* जाधे कोहसंजलणस्स पढमट्टिवीए समयूणावलिया सेसा ताधे चेव कोहसंजलणस्स बंधोदया वोच्छिण्णा । २२६. कुदो एत्थ उच्छिट्ठावलियाए समयूणत्तमिदि णासंकणिज्जं, तम्मि चेव समये उदयवोच्छेदवसेण पढमणिसेगहिदीए माणसंजलणोदयम्मि त्थिवुक्कसंकमेण संकममाणाए तिस्से तहाभावोवलंभादो । * माणसंजलणस्स पढमसमयवेदगो पढमट्टिदिकारओ च ।। $ २२७. कोहसंजलणस्स पढमद्विदिं समयूणुच्छिट्ठावलियवज्जं गालिय तब्बंधोदयवोच्छेदं कादण द्विदो तम्मि चेव समये माणसंजलणस्स पढमसमयवेदगो होइ । कधं पुण विदियट्ठिदीए. समवद्विदस्स माणसंजलणस्स तकाले चेय उदयसंभवो होदि त्ति आसंकाए इदमाह 'पढमद्विदिकारओ चेदि' विदियट्टिदीए समवट्ठिदं माणसंजलणस्स इस क्रमसे क्रोधसंज्वलनकी प्रथम स्थितिको गलानेवाले जीवके जब क्रोधसंज्वलनकी प्रथम स्थिति उच्छिष्टावलिप्रमाण शेष रहती है तब क्रोधसंज्वलनके बन्ध और उदय व्युच्छिन्न हो जाते हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र आया है * जब क्रोधसंज्वलनकी प्रथम स्थितिमें एक समय कम एक आवलि शेष रहती है तभी क्रोधसंज्वलनके बन्ध और उदय व्युच्छिन्न हो जाते हैं। ६२२६. शंका--यहाँ पर उच्छिष्टावलिमें एक समय कम किस कारणसे किया ? समाधान-ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसी समय उदयकी व्युच्छित्ति हो जानेके कारण प्रथम निषेकस्थितिके मानसंज्वलनके उदयमें स्तिवुक संक्रमके द्वारा संक्रमित हो जाने पर उसकी उस प्रकारसे उपलब्धि होती है। विशेषार्थ-जो क्रोधसंज्वलनके उदयका अन्तिम समय है उसके तदनन्तर समयमें उसकी उद्यावलिका अधस्तन प्रथम निषेक मानसंज्वलनमें स्तिवुकसंक्रमके द्वारा संक्रमित हुए रहनेसे उसमें से एक निषेकके कम हो जानेके कारण यहाँ पर उच्छिष्टावलिमेंसे एक समय कम किया। * तथा तभी वह मानसंज्वलनका प्रथम समय वेदक और प्रथम समय कारक होता है। ६२२७. एक समय कम उच्छिष्टावलिके सिवाय क्रोधसंज्वलनकी प्रथम स्थितिको गलाकर तथा उसके बन्ध और उदयकी व्युच्छित्ति करके स्थित हुआ जीव उसी समय मानसंज्वलनका प्रथम समय वेदक होता है। शंका--द्वितीय स्थितिमें स्थित मानसंज्वलनका उसी समय उदय कैसे सम्भव है ? समाधान--ऐसी शंका होने पर 'प्रथम स्थितिका करनेवाला' होता है' यह वचन कहा है। द्वितीय स्थितिमें स्थित मानसंज्वलनके प्रदेशपुजको अपकर्षितकर उदयादि गुणश्रेणि
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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