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________________ २७२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणी-उवसामणा १७२. एवमेदमत्थमुवसंहरिय संपहि एत्तो उवरि णqसयवेदादिपयडीणं जहाकममुवसामणाविहाणं परूवेमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * अंतरादो पढमसमयकदादो पाए णवुसयवेदस्स आउत्तकरणउवसामगो, सेसाणं कम्माणं ण किंचि उवसामेदि । ६१७३. एत्तो प्पहुडि अंतोमुहत्तमेत्तकालं णव॒सयवेदस्स आउत्तकिरियाए उवसामगो होइ, सेसाणं कम्माणं ण ताव किंचि उवसामेदि तेसिमुवसामणकिरियाए अज्ज वि पारंभाभावादो त्ति भणिदं होइ । किमाउत्तकरणं णाम ? आउतकरणमुअत्तकरणं पारंभकरणमिदि एयट्ठो। तात्पर्येण नपुंसकवेदमितः शमयत्युपशमयतीत्यर्थः । एवमाउत्तकिरियाए णवंसयवेदोवसामणमाढविय उवसामेमाणो समयं पडि असंखेज्जगुणाए सेढीए गसयवेदपदेसग्गमुवसंतं करेदि त्ति पदुप्पायणट्टमुत्तरसुत्तं भणइ * जं पढमसमये पदेसग्गमुवसामेदि तं थोवं । जं विदियसमये उवकरनेके लिए उस समय बँधनेवाले पुरुषवेदको जो उदाहरणरूपमें उपस्थित किया है वह यद्यपि कल्पित है, क्योंकि उपशमश्रेणिमें क्रोध, मान और मायाका कृष्टिकरण नहीं होता । यह सब क्षपकश्रेणिमें सम्भव है । तथा आपकोणिमें भी पुरुषवेदका कृष्टिकरणके कालमें बन्ध नहीं होता,इसलिये पुरुषवेदके नवीन बन्धको विषय बनाकर जो निदर्शन उपस्थित किया गया है वह मात्र कल्पित है। फिर भी उससे इस परमार्थका ज्ञान हो जाता है कि अन्तर क्रियाके सम्पन्न होनेके प्रथम समयसे लेकर वहाँ बँधनेवाले कर्मोंकी उदीरणा बन्ध समयसे छह आवलियोंके बाद होती है, इसके पूर्व नहीं। १७२. इस प्रकार इस अर्थका उपसंहारकर अब इससे ऊपर नपुंसकवेद आदि प्रकृतियोंके क्रमसे उपशामनाविधिका कथन करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * अन्तर किये जानेके प्रथम समयसे लेकर नपुंसकवेदका आयुक्तकरण उपशामक होता है, शेष कर्मोंको किश्चिन्मात्र भी नहीं उपशमाता है । 5 १७३. यहाँसे लेकर अन्तर्मुहूर्तकाल तक नपुंसकवेदका आयुक्त क्रियाके द्वारा उपशामक होता है, शेष कोंको तो किश्चिन्मात्र भी नहीं उपशमाता है, क्योंकि उनकी उपशामनक्रियाका अभी भी प्रारम्भ नहीं हुआ है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। शंका-आयुक्तकरण किसे कहते हैं ? समाधान-आयुक्तकरण, उद्यतकरण और प्रारम्भकरण ये तीनों एकार्थक हैं । तात्पर्य रूपसे यहाँसे लेकर नपुंसकवेदको उपशमाता है यह इसका अर्थ है। इस प्रकार आयुक्तक्रियाके द्वारा नपुंसकवेदके उपशमानेका आरम्भकर उपशमाता हुआ प्रति समय असंख्यातगुणी श्रेणिरूपसे नपुंसकवेदके प्रदेशपुञ्जको उपशान्त करता है इस बातका कथन करनेके लिए आगेके सूत्रको कहते हैं * प्रथम समयमें जिस प्रदेशपुञ्जको उपशमाता है वह स्तोक है । दूसरे समयमें
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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