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________________ गाथा १२३ ] चरितमोहणीय-उवसामणाए करणकज्जणिद्देसो $ १४९. जे कम्मंसा बज्झति च वेदिज्जंति च, जहा पुरिसवेदो अण्णदरसंजलणो वा, सिमंतरट्ठदीसु उक्कीरिज्जमाणं पदेसग्गं कत्थ णिक्खिवदि त्ति चे १ वुच्चदेवंधपयडीणमुदइल्लाणं पढमट्टिदीए च ओकड्डिदूण देदि, बंधपयडीणमेव विदियट्ठिदीए च देदि, बंधसब्भावेण तत्थुक्कड्डणाए विरोहाभावादो । तदो बंधोदयसहिदाणं पयडीणतरी उकीरिजमाणस्स पदेसग्गस्स समयाविरोहेण बंधपयडीणं पढम-विदियहिदी संचरण मविरुद्धमिदि सिद्धो सुत्तत्थसम्भावो । संपहि जेसिं बंधो उदयो च णत्थि, जहा अट्ट कसाय छण्णोकसायाणं, तेसिमंतरद्विदीसुकीरिजमाणं पदेसग्गं कत्थ कथं संहदि ति आसंका इदमाह -- २५७ * जे कम्मंसा ण बज्भंति ण वेदिजति तेसिमुक्कीरमाणं पदेसग्गं सत्थाणे ण देदि, बज्झमाणीणं पयडीणमणुकीरमाणीसु द्विदीसु देदि । $ १५०. कुदो एदेसिं पदेसग्गं सत्थाणे ण देदि १ उदयाभावेण पढमहिदिसंबंधाभावादो बंधसंबंधाभावेण विदियट्ठिदीए उक्कड्डुणाभावादो च । तदो सत्थाणपरिहारेण णिरुद्धपयडीणमंतर डिदिसुकीरिजमाणं पदेसग्गं बज्झमाणपयडीणं विदियबंधपढमणिसेयमादि काढूणुवरिमबंधट्ठिदीसु उकडणाए णिक्खिवदि सोदयाणं $ १४९ शंका – जो कर्मपुञ्ज बँधते हैं और वेदे जाते हैं, जैसे कि पुरुषवेद और अन्यतर संज्वलन, उनकी अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंमें से उत्कीरण होनेवाले प्रदेशपुंजको कहाँ करता है ? समाधान -- कहते हैं, उदयवाली बन्धप्रकृतियोंकी प्रथम स्थिति में अपकर्षित करके देता है और बन्ध प्रकृतियों को ही द्वितीय स्थिति में देता है, क्योंकि वन्धरूप होनेसे उनमें उत्कर्षण होनेमें विरोधका अभाव है । इसलिये बन्ध और उदयसहित प्रकृतियोंकी अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंमेंसे उत्कीर्ण होनेवाले प्रदेशपुंजका आगमके अनुसार यथाविधि बन्धप्रकृतियों की प्रथम और द्वितीय स्थितियों में सचरण अविरूद्ध है इस प्रकार सूत्रार्थ सिद्ध होता है। अब जिन प्रकृतियों का बन्ध और उदय दोनों नहीं होते, जैसे आठ कंपाय और छह नोकषाय, उनकी अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंमेंसे उत्कीर्ण होनेवाले प्रदेशपुञ्जको कहाँ किस प्रकार निक्षिप्त करता है ऐसी आशंका होनेपर इस सूत्र को कहते हैं- * जो कर्मपुञ्ज न बँधते हैं और न वेदे जाते हैं उनके उत्कीर्ण किये जानेवाले प्रदेशपुञ्जको स्वस्थानमें नहीं देता है, बन्धको प्राप्त होनेवाली प्रकृतियोंकी अनुत्कीर्ण होनेवाली स्थितियों में देता है । $ १५० शंका - - इनके प्रदेशपुञ्जको स्वस्थानमें क्यों नहीं देता है ? समाधान—क्योंकि उदयका अभाव होनेसे एक तो इनका प्रथम स्थिति से सम्बन्धका अभाव है, दूसरे इनके बन्धरूप न होनेसे द्वितीय स्थिति में उत्कर्षणका अभाव है । इसलिये स्वस्थानके परिहार द्वारा विवक्षित प्रकृतियोंकी अन्तरसम्बन्धी स्थिति उत्कीर्ण होनेवाले ३३
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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