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________________ २५६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ चरित्तमोहणीय-उवसामणा द्विदिखंडयाणुभागखंडयाणं समत्तिवसेण अण्णो द्विदिबंधी असंखेज्जगुणहाणीए बंधिदुमाढत्तो, अण्णं च द्विदिखंडयं पलिदावमस्स संखेज्जदिभागपमाणेणागाइदमणुभागखंडयं च सेसस्साणंता भागा आगाइदा त्ति सुत्तत्थसंबंधो। एवमक्कमेणाढत्ताणमेदेसि समत्ती कधं होदि त्ति चे वुच्चदे-- ____ * अणुभागखंडयसहस्सेसु गदेस अण्णमणभागखंडयं तं चेव हिदिखंडयं सो चेव हिदिबंधो अंतरस्स उक्कीरणद्धा च समगं पुण्णाणि । ६१४८. कुदो एवं चे ? अणुभागखंडयसहस्साणि अब्भंतरं करिय द्विदतकालभाविट्ठिदिबंध-डिदिखंडयकालेहिं अंतरकरणद्धाए सरिसपमाणब्भुवगमादो । तदो एगट्ठिदिबंधकालमत्तेण कालेणंतरकरणं समाणेदि ति एसो एत्थ सुत्तत्थसब्भावो । संपहि एत्तिएण कालेणंतरं कुण माणो अंतरहिदीणमुक्कीरिजमाणं पदेसग्गं कत्थ णिक्खिवदि, किं विदियट्ठिदीए, किं वा पढमट्ठिदीए, आहो उहयत्थ णिक्खिवदि त्ति आसंकाए णिच्छयविहाणहमुत्तरं पबंधमाह-- * अंतरं करेमाणस्स जे कम्मंसा बझंति वेदिजति तेसि कम्माणमंतरहिदिशो उक्कीरेंतो तासि हिदीणं पदेसग्गं बंधपयडीणं पढमट्टिदीए च देदि विदियहिदीए च देदि । स्थितिकाण्डक और अनुभागकाण्डक समाप्त हो जानेके कारण अन्य स्थितिबन्धको असंख्यात गुणहानिरूपसे बाँधनेके लिये आरम्भ किया, अन्य स्थितिकाण्डकको पल्योपमके संख्यातवें भाग प्रमाणरूपसे ग्रहण किया और शेष अनुभागके अनन्त बहुभागको ग्रहण किया यह इस सूत्रका अर्थके साथ सम्बन्ध है। इस प्रकार युगपत् आरम्भ किये गये इनकी समाप्ति कैसे होती है ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं * हजारों अनुभागकाण्डकोंके व्यतीत होनेपर अन्य अनुभागकाण्डक, वही स्थितिकाण्डक, वही स्थितिबन्ध और अन्तरका उत्कीरणकाल एक साथ सम्पन्न होते हैं । १४८ शंका--ऐसा किस कारणसे है ? समाधान--हजारों अनुभागकाण्डकोंको भीतरकर तत्काल होनेवाले स्थितिबन्ध और स्थितिकाण्डकके कालके समान अन्तरकरणका काल स्वीकार किया गया है। अतः एक स्थितिबन्धकालप्रमाण कालके द्वारा अन्तरकरणको सम्पन्न करता है यह यहाँ सूत्रके अर्थका तात्पर्य है। अब इतने काल द्वारा अन्तरको करता हुआ अन्तरसम्बन्धी स्थितियोंके प्रदेशोंको उत्कीर्ण कर कहाँ निक्षिप्त करता है, क्या द्वितीय स्थितिमें निक्षिप्त करता है या क्या प्रथम स्थितिमें निक्षिप्त करता है ऐसी आशंका होनेपर निश्चय करनेके लिये आगेके प्रबन्धको कहते हैं - ___ * अन्तर करनेवाले जीवके जो कर्मपुञ्ज बधते हैं और वेदे जाते हैं उन कर्मोंकी अन्तरस्थितियोंको उत्कीरण करता हुआ उन स्थितियोंके प्रदेशपुञ्जको बन्धको प्राप्त होनेवाली प्रकृतियोंकी प्रथम स्थितिमें देता है और द्वितीय स्थितिमें देता है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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