SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 287
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २४४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणा * तदो जो एसो हिदिबंधो णामा-गोदाणं थोवो । मोहणीयस्स हिदिबंधो असंखेजगुणो। इदरेसिं चदुण्हं पि कम्माणं ट्ठिदिबंधो तुल्लो असंखेजगुणो। ___$ ११३. गयत्थमेदं सुत्तं । णेदस्स पुणरुत्तभावो आसंकणिज्जो, पुव्वं सामण्णेण परूविदस्स अप्पाबहुअस्स कारणमुहेण विसेसियूण परूवणे तद्दोसासंभवादो। * एदेणअप्पाबहुअविहिणा हिदिबंधसहस्साणिजाधे बहूणि गदाणि । $ ११४. एदेणप्पाबहुअपयारेणाणंतरपरूविदेण द्विदिबंधोसरणसहस्साणि जाधे बहुणि गदाणि ताधे अण्णारिसो अप्पाबहुअविसेसो होदि त्ति वु होइ। ___* तदो अण्णो हिदिबंधो एकसराहेण मोहणीयस्स थोवो । णामागोदाणमसंखेजगुणो । इदरेसिं चदुण्हं पि कम्माणं तुल्लो असंखेजगुणो । ११५. सुगमो च एसो अप्पाबहुअपयारो, विसेसघादवसेण सुट्ट, ओहट्टमाणस्स मोहणीयट्ठिदिबंधस्स णामा-गोदद्विदिबंधादो वि थोवभावसिद्धीए पडिबंधाभावादो। * तत्पश्चात् जो यह स्थितिबन्ध प्रारम्भ होता है, उसकी अपेक्षा नामकर्मका और गोत्रकर्मका स्थितिबन्ध सबसे अल्प है, उससे मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध असंख्यातगुणा है । उससे इतर चारों ही कर्मोंका स्थितिबन्ध परस्पर तुल्य होकर असंख्यातगुणा है। $ ११३. यह सूत्र गतार्थ है। इसके पुनरुक्तपनेकी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पहले सामान्यरूपसे कहे गये अल्पबहुत्वका कारणके साथ विशेषरूपसे कथन करनेमें पुनरुक्त दोष सम्भव नहीं है। * इस अल्पबहुत्वविधिसे जब बहुत हजार स्थितिबन्ध व्यतीत हुए। $ ११४. अनन्तर पूर्व प्ररूपित इस अल्पबहुत्वप्रकारके द्वारा बहुत हजार स्थितिबन्धापसरण व्यतीत हुए, तब अन्य प्रकारका अल्पबहुत्व भेद होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। ___* तत्पश्चात् अन्य स्थितिबन्ध प्रारम्भ होता है, उसकी अपेक्षा एक बारमें मोहनीय कर्मका स्थितिबन्ध सबसे अल्प हो जाता है। उससे नामकर्म और गोत्रकर्मका स्थितिबन्ध असंख्यातगुणा होता है । उससे इतर चार कर्मोंका भी स्थितिबन्ध परस्पर तुल्य होकर असंख्यातगुणा होता है। . $ ११५. यह अल्पबहुत्वका प्रकार सुगम है, क्योंकि विशेष घात होनेके कारण बहुत अधिक घटनेवाले मोहनीयके स्थितिबन्धके नाम और गोत्रकर्म के स्थितिबन्धसे भी स्तोकपनेकी सिद्धि होनेमें कोई प्रतिबन्ध नहीं पाया जाता।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy