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________________ गाथा १२३ ] चरितमोहणीय-उवसामणाए करणकज्जणिद्देसो * तिस्से चेव अणियहिअद्धाए पढमसमये अप्पसत्थउवसामणाकरणं णिधत्तीकरणं णिकाचणाकरणं च वोच्छिण्णाणि । $ ७६. सव्वेसिं कम्माणमणियद्विगुणद्वाणपवेसपढमसमए चैव एदाणि तिण्णि वि करणाणि अक्कमेण वोच्छिण्णाणि त्ति भणिदं होइ । तत्थ जं कम्ममोकड्डुकड्डण-परपयडिसंकमाणं पाओग्गं होतॄण पुणो णो सक्कमुदयट्ठिदिमोकडिदु उदीरणाविरुद्धसहावेण परिणदत्तादो तं तहाविहपइण्णाए पडिगहियमप्पसत्थउवसामणाए उवसंतमिदि भण्णदे । तस्स सो पज्जायो अप्पसत्थउवसामणाकरणं णाम । एवं जं कम्ममोकड्डुक्कड्डणासु अविरुद्धसंचरणं होण पुणो उदय-परपयडिसंकमाणमणागमणपइण्णाए पडिग्गहियं तस् सो अवस्थाविसेस णिधत्तीकरणमिदि भण्णदे । जं पुण कम्मं चदुण्णमेदेसिं उदयादीणमाओri होणावाणपइण्णं तस्स तहावट्ठाणलक्खणो पजाय विसेसो णिकाचणाकरणं णाम । एवमेदाणि तिणि वि करणाणि हेट्ठा सव्वत्थ पयट्टमाणाणि । एदेसु वोच्छिण्णेसु सव्वमेव कम्ममोकड्डिदुमुकडिदुमुदीरेढुं परपयडीसु च संकामेदुं तप्पाआग्गभावमुवगयमिदि एसो दस्स सुत्तस्स भावत्थो । संपहि एत्थेव द्विदिसंत-ट्ठिदिबंधाणमियत्तावहारणट्ठमुत्तरमुत्तद्दय मोइण्णं- * आउगवज्जाणं कम्माणं द्विदिसंतकम्ममंतो को डाकोडीए * उसी अनिवृत्तिकरणकालके प्रथम समय में अप्रशस्त उपशामनाकरण, निधत्तीकरण और निकाचनाकरण व्युच्छिन्न होते हैं । $ ७६. सभी कर्मों के अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में प्रवेश करनेके प्रथम समय में ही ये तीनों ही करण युगपत् व्युच्छिन्न हो जाते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । उसमें जो कर्म अपकर्षण, उत्कर्षण और परप्रकृतिसंक्रमके योग्य होकर पुनः उदीरणाके विरुद्ध स्वभावरूपसे परिणत होनेके कारण उदयस्थिति में अकर्षित होनेके अयोग्य है वह उस प्रकार से स्वीकार की गई अप्रशस्त उपशामनाको अपेक्षा उपशान्त ऐसा कहलाता है । उसकी उस पर्यायका नाम अप्रशस्त उपशामनाकरण है । इसी प्रकार जो कर्म अपकर्षण और उत्कर्षणके अविरुद्ध पर्यायके योग्य होकर पुनः उदय और परप्रकृतिसंक्रमरूप न हो सकनेकी प्रतिज्ञारूपसे स्वीकृत है उसकी उस अवस्था विशेषको निधत्तीकरण कहते हैं । परन्तु जो कर्म उदयादि इन चारोंके अयोग्य होकर अवस्थानकी प्रतिज्ञामें प्रतिबद्ध है उसकी उस अवस्थानलक्षण पर्यायविशेषको निकचनाकरण कहते हैं । इस प्रकार ये तीनों ही करण इससे पूर्व सर्वत्र प्रवर्तमान थे, यहाँ अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें उनकी व्युच्छित्ति हो जाती है । इनके व्युछिन्न होनेपर सभी कर्म अपकर्षण, उत्कर्षण, उदीरणा और परप्रकृतिसंक्रम इन चारोंके योग्य हो जाते हैं यह इस सूत्रका भावार्थ है । अब यहीं पर स्थितिसत्त्व और स्थितिबन्ध इनके प्रमाणका अवधारण करनेके लिये आगेके दो सूत्र आये हैं २३१ * आयुकर्मको छोड़कर शेष कर्मोंका स्थितिसत्कर्म अन्तःकोड़ाकोड़ी सागरोपमके भीतर होता है । १. निकायनाकरणका स्वरूप छूटा है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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